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बोतल में बन्द चिट्ठी ..


उन फुदकती चिड़ियाँ
जिनके पैरों में बँधे थे
छोटे संदेसे
किसी मंदिर के कँगूरे से
बजती घंटियाँ
आवाज जो टकरातीं थी
सामने की पहाड़ी से
उन कविताओं को सुनते
गिरते हैं शब्द किसी तालाब में
सतह पर फैलता है वृत्त
अर्थ गायब हो जाते हैं
कभी तल पर बालू में
कभी गोल चमकीले पत्थर में
कभी तैरती मछली के पेट में
बात हमेशा अपना सिरा खोजती है
चाहे कितना फेंको उसे मछुआरे जाल में
बंधेगी फँसेगी आखिर
कोई कागज़ की नाव तो नहीं
या कोई बोतल में बंद
चिट्ठी भी नहीं
जो मिलेगी
सदियों बाद किसी बच्चे को
समन्दर के किनारे
रेत का घर बनाते
या फिर कौन जाने
किसी टाईमवार्प में
किसी अतीत के समय में
अपने पूरे रहस्य से भरपूर ? और
तुम कहोगे अरे ! ये तो मेरे ही शब्द हैं जिन्हें कहा था
मैंने सदियों पहले किसी भविष्य में ॥

1 comment

परमजीत सिहँ बाली said...

बहुत सुन्दर रचना है बधाई।

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