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पागल

मेरी यह लघुकथा 'जनसत्ता सबरंग' के 6 मई 2001 के अंक में प्रकाशित हुई थी। मेरी इच्छा है कि ब्लागर भाई इस लघुकथा को पढ़ने के बाद आज के संदर्भ में नए रूप में गढें, ताकि आपके विचार सामने आ सके। सुनील मंथन शर्मा

पागल

लड़का बी ए करने के बाद कंप्यूटर सीखकर एक कंपनी में साल भर से नौकरी कर रहा है। चार हजार रुपये प्रत्येक महीने तनख्वाह मिलती है. पिता रेलवे में नौकरी करते हैं. खाता-पीता संपन्न घर है. परिवार में मात्र चार जन हैं. माता-पिता और भाई-बहन।

यह सब जानकर ही रामलाल जी अपनी लड़की की शादी की बात करने गए थे लड़के के घर। नाश्ता करने के बाद दहेज़ की बात पर आ गए. लड़के के पिता बोले, 'दहेज़ क्या लेना-देना। भगवान की कृपा से जितना है, बहुत है। और दहेज़ लेकर ही क्या करूँगा. सिर्फ़ दुल्हन चाहिए. दुल्हन ही तो दहेज़ है।'

सुनकर माथा ठनक गया रामलाल जी का. चुप से बाहर निकल गए. घर वापस आकर परिवार वालों से कहा, 'वहां शादी नहीं होगी. पागल है स्साला. दहेज़ लेना ही नहीं चाहता है.'

2 comments

अनुनाद सिंह said...

सुनिल जी,

आपका हिन्दी ब्लागजगत में स्वागत है।

कथा अच्छी लगी। समाज विडम्बनाओं से भरा प।दा है।

sandhyagupta said...

Aapki laghukatha ne prabhavit kiya.

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