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नई डिग्रियां (भाग-3)

उसके दूसरे ही दिन से शैल ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया था। उसपर मधुमिता की खुमारी चढ़ चुकी थी। मधुमिता अपने दोस्तों से, अपनी सहेलियों से उसका परिचय कराती और परिचय होने के साथ-साथ शैल उसपर अपना सिक्का जमा देता था। उसी तरह मधुमिता अपनी सहेलियों से उसका परिचय कराती और उसके बाद वे भी उसकी भक्तिन बन जाती थी।
इस दरम्यान शैल ने मार्क किया कि मधुमिता जितनी खुली दिखती थी, असल में उतनी खुली नहीं थी। अपने दोस्तों से वह खुलकर मिलती थी, परन्तु किसी को अपने पुट्ठे पर हाथ रखने तक नहीं देती थी। वह अपनी सहेलियों को सीख देती थी कि खुलकर मिलने, हंसने, बोलने या डांस करने में कोई हानि नहीं है, परन्तु यदि तुमने उसे पुट्ठे पर हाथ रखने दिया तो फिर दूसरे दिन से तुम उसके लिए बासी फूल बन जाओगी। उसका वह चार्म तुममें नहीं रह जाएगा।
खैर जो हो, फिर भी मधुमिता के दोस्तों की लम्बी सूची थी। उसी तरह सहेलियों की सूची भी लम्बी ही थी। उन सबसे परिचय कराते-कराते लगभग पन्द्रह दिन बीत गए थे। लेकिन शैैल अपने उद्देश्य में सफल होता गया था। उसने उन सबों को एक सूत्र में पिरोना जो शुरू किया तो बहुत जल्द ही एक बड़ा गैंग तैयार कर लिया था। उसके बाद विचार हुआ कि पूरे गैंग की एक बैठक की जाय। सवाल उठ गया कि खुले आम गैंग की बैठक की जाय अथवा अभी छुपे रूस्तम ? क्योंकि अजय सिंह और अवध सिन्हा से तब बाकी छात्र-छात्राएं भय खाते थे। अंत में तय हुआ कि गुप्त बैठक ही की जाय। इसके लिए दिन भी वैसा ही उपयुक्त चुना गया।
उस दिन अजय सिंह और अवध सिन्हा अपनी शैतान मंडली के साथ दूर एक रम्य स्थान में पिकनिक मनाने गए थ,े तब झूठ में जन्मदिन के बहाने संतराम विद्रोही जी के उस हॉलनुमा मकान में शैल-मधुमिता गैंग की गुप्त बैठक हो रही थी। शैल की ओज भरी बातों ने सभी छात्र-छात्राओं में नयी शक्ति व नयी स्फूर्ति का संचार किया।
‘‘छात्र भाइयों एवं छात्रा बहनों। कितना सटीक फिल्म शोले में गब्बर सिंह ने कहा था ‘‘जो डर गया वह मर गया’’। अजय सिंह एवं अवध सिन्हा कोई शेर-बब्बर नहीं है, जो हमें खा जाएगा। उसे भी दो ही हाथ और दो ही पैर हैं। उनसे दबना कैसा और उनके जुल्मों को सहना कैसा? आप सब मेरे पीछे रहेंगे। पहले मेरी लाश गिरेगी, उसके बाद ही आपलोगों को कुछ होगा? रही उनकी तरफदारी सत्ताधारी दल वाले करते हैं तो हमारे साथ भी बाबू संतराम विद्रोही जी हैं। हम ईंट से ईंट बजाकर रख देंगे। ‘‘बस हम संकल्प कर लें कि उनके जुल्मों को नहीं सहेंगे।’’
शैल का इतना कहना था कि सभी छात्र-छात्राएं एक स्वर में बोल उठे ‘‘हम जुल्म नहीं सहेंगे’’।
इसके बाद संतराम विद्रोही जी ने भी छात्र-छात्राओं को पूर्ण आश्वासन दिया कि सत्ताधारी दल उनका बाल बांका भी नहीं कर सकता है।
बाद में शैल को मुख्य संयोजक चुना गया तथा छात्राओं की ओर से मधुमिता को सहायिका, एक एडहॉक कमिटी का भी गठन कर लिया गया था। सुबह ही सभी छात्र-छात्राएं आ गई थी। उनके जलपान, दोपहर का भोजन एवं संध्या समय अल्पाहार के साथ चाय वगैरह सबका इंतजाम संतराम विद्रोही जी की ओर से किया गया था। विद्रोही जी की पत्नी श्रीमती सावित्री देवी के एक-दो नहीं, सात आठ बसें लम्बी-लम्बी रूट की चलती थीं। अलावा आठ-दस ट्रक भी थे, जो सब भाड़े पर चलते थे। इस तरह सावित्री देवी की लम्बी-चौड़ी आय थी और इस तरह की बैठकें या सम्मेलन कराने से विद्रोही जी जरा भी नहीं हिचकते थे।
अब शैल और उसका नवगठित गैंग मौके की तलाश में लग गया, वर्तमान अध्यक्ष और उपाध्यक्ष को अपनी मारकशक्ति दिखाने एवं उनपर अपना सिक्का जमाने के लिए।
आखिर वह मौका उन्हें लग ही गया। मधुमिता और उसकी सहेली-सह-सहपाठिन रजनी मेहता जिस क्लास में पढ़ती थी, वहां वर्तमान उपाध्यक्ष अवध सिन्हा भी पढ़ता था। रजनी आगे के सीट पर होती थी और ठीक उसके पीछे अवध सिन्हा। ऐसे में अवध सिन्हा प्रायः रजनी को छेड़ते रहता था और मौका पाकर उसके साथ अभद्र व्यवहार भी कर देता था।
रजनी भी एड़हॉक कमिटी की एक सदस्या थी। अतः इस बाबत एडहॉक कमिटी में कुछ गुप्त मंत्रणा की गई थी और प्रतीक्षा की जाने लगी थी कि अवध रजनी के साथ छेड़-छाड़ और कोई अभद्र व्यवहार करे।
तभी उस दिन रजनी टाइट सलवार सुट पहनकर आई थी कि अवध ने उसे छेड़ दिया था। प्रोफेसर वर्मा लेक्चर दे रहे थे कि पीछे से अवध ने रजनी की चोटी पकड़कर खींच दी थी। इस पर बगल में बैठी मधुमिता से उसने कुछ गुफ्तगू की। खैर, लेक्चर खत्म हुआ और सब छात्र-छात्राएं निकलने लगे। रजनी भी चली और उसके पीछे अवध भी कि हठात अवध ने रजनी के निम्न उभारों को पीछे से थपक दिया था।
फिर क्या था? रजनी तत्काल उसपर बिफर कर टूट पड़ी थी। उसने आव देखा न ताव, झट पैर से चप्पल खोलकर तड़ातड़ उसपर जमाने लगी।
‘‘मार-मार रजनी-मार साले को। बड़ा हीरो समझता है अपने को। मार-मार...’’ मधुमिता ने पीछे से रजनी को और उत्साह दिलाना शुरू कर दिया था।
फिर तो तुरंत एक मजमा वहां लग गया था। रजनी शेरनी के समान उसपर बिफर रही थी, ‘‘स्टूपिड, इडियट, लोफर कहीं का। बड़ा उपाध्यक्ष बने फिरता है। आज तुझे यहीं मार कर गाड़ दूंगी।’’ बिफरती रजनी अन्य छात्राओं की पकड़ से छूटने का प्रयास कर रही थी।
कुछ छात्राओं ने उसे पकड़कर अलग कर रखा था। हो-हल्ला सुन अजय सिंह अवध की सहायता के लिए आया तो शैल भी दहाड़ता सा वहां आ पहुंचा था।
अब तो भारी बवाल मचने का खतरा उत्पन्न हो गया था। झट कई प्रोफेसर वहां बीच-बचाव करने आ पहुंचे थे। प्रिंसिपल साहब के पास रिपोर्ट हो गई तो उन्होंने उन सब को अपने कार्यालय कक्ष में बुलाया और पूछताछ शुरू की।
सबसे पहले रजनी ने अवध की अभद्रता कह सुनाई। तब प्रिंसिपल साहब ने अवध से इस बाबत पूछा था।
‘‘सर, ऐन मौके पर सहवाग ने एक जबरदस्त छक्का मारा था कि उसी खुशी में ‘‘हिप-हिप-हुर्रे’’ की मुद्रा में मेरा हाथ ऊपर उठा था और अनजाने रजनी के निम्न उभारों से जा टकराया था।’’ अवध ने एक बहाना बनाया।
‘‘अयं, क्या कहा कि सहवाग ने छक्का मारा था? तो क्या कॉलेज परिसर में सहवाग खेल रहा था?’’
‘‘सर, मिनी ट्रांजिस्टर से तब मैं क्रिकेट की कमेंट्री सुन रहा था।’’
‘‘तो क्लास रूम में तुम लेक्चर सुनते हो या क्रिकेट कमेंट्री ? और फिर जब तुमसे गलती हो ही गई थी तो क्यों नहीं झट से क्षमा मांग ली थी रजनी से ?’’
‘‘सर क्षमा मांगने का अवसर ही कहां दिया रजनी ने, वह झट चप्पल खोल मुझपर बरसाने लगी।’’
यह सुनकर शैल पक्ष के जो छात्र-छात्राएं वहां थी, हल्के से हंस पड़ी थी। इस पर आग्नेय नजरों से अजय सिंह उन्हें देखने लगा था।
‘‘सर यह झूठ-मूठ का बहाना करता है। इसने जान-बूझ कर मेरे साथ अभद्रता की थी।’’ इसपर रजनी ने पुनः कहा।
‘‘एक्सक्यूज मी सर। सच पूछा जाय तो रजनी जी और अवध के बीच में कुछ अफेयर चल रहा था। इसी से ऐसा कुछ एक्सीडेंट हुआ होगा।’’ बीच में ही तब अजय सिंह बोल पड़ा था।
‘‘सर, इनकी मां-बहनें अफेयर चलाती होंगी। इसी से इन्हें हर लड़की में अफेयर नजर आता है।’’ तभी बीच में टपक कर मधुमिता बोली थी।
‘‘सर, देखिए इसने बीच में टपक कर मुझे गाली दी।’’ अजय ने तब प्रतिवाद किया था।
‘‘वाह, अजय बाबू को बीच में टपकने और किसी को गाली देने की छूट है क्या ? और दूसरे को नहीं ?’’ तभी बीच में शैल भी टपक पड़ा था।
‘‘सर यह बीच में कैसे बोला ?’’ अवध ने शैल के बीच में टपकने पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई थी।
‘‘ऐ मिस्टर, अजय तो छात्र यूनियन का अध्यक्ष है इसी से बीच में बोला, लेकिन आप....’’
‘‘सर, रजनी और मधुमिता दोनों मेरी धर्म बहनें हैं और बहन की इज्जत.-आबरू की रक्षा करना एक भाई का काम है। वह तो कहिए कि यह कॉलेज परिसर है और उस पर आपका कार्यालय कक्ष, वर्ना इस तरह मेरी धर्म बहन के साथ अभद्र व्यवहार करने वाले का हाथ और गाली देने वाले का मुंह मैं कब का तोड़ चुका होता...’’
‘‘अरे रे साला मच्छर कहीं का। जुबान बंद रख, वर्ना यहीं तेरी कब्र बन जाएगी।’’ तभी अजय ने क्रोध से कहा।
‘‘अरे ऐ हिजड़ा, तू क्या कर लेगा शैल भैया का ? साला बड़ा हिटलर बन गया है। कहता है रजनी और अवध के बीच अफेयर चल रहा है। तुम्हारी मां का अफेयर किस से चल रहा है रे मरदुद कहीं का ?’’ रजनी ने बिफर कर अजय को वहीं गाली देना शुरू कर दिया।
‘‘अरे-रे बंद करो। एकदम बंद करो। नो अल्टरकेश्न एट ऑल। भागो तुमलोग सब जाओ। आइन्दे ऐसी कोई हरकत कॉलेज परिसर में नहीं होनी चाहिए, वर्ना मैं उसके खिलाफ कड़ा से कड़ा एक्शन लूंगा।’’ प्रिंसिपल साहब ने कहा और सबको कार्यालय कक्ष से बाहर निकाल दिया था।
‘‘अजय भैया, कहां से साला यह नया-नया रंगरूट आया है? कॉलेज आए साले का अभी जुम्मा-जुम्मा आठ दिन भी नहीं हुआ है और हमें ही आंख दिखाता है।’’ प्रिंसिपल साहब के कार्यालय कक्ष से बाहर निकलते ही अवध बोला था।
‘‘हाँ, साला मच्छर भिनभिना रहा था। बस आज शाम ही इसे मसल देना है तथा इस साली रजनी को हाथ उठाने की सजा कॉलेज परिसर से बाहर निकलते ही सरेआम सबके सामने एकदम नंगी करके देना है। देखें कौन माई का लाल उसे बचाने आता है।’’ जवाब में अजय ने इतना जोर से कहा कि प्रतिद्वंद्वी दल के लोग सुन लें।
‘‘चलो भी रजनी, कुत्तों को भूकने दो। साले किसमें दम है कि मेरी धर्म बहन को छू भी लेगा। एक-एक कर सालों को छठी का दूध याद नहीं दिला दिया तो व्यर्थ मेरी मां ने मुझे जन्म दिया है।’’ शैल ने भी तब ऊंचे स्वर में उन्हें चैलेंज दे डाला था।
इसके बाद तो कॉलेज का वातावरण एकदम गरम हो उठा था। कॉमन रूम में अजय गु्रप की मंत्रणा होने लगी तो कैंटीन में शैैल गु्रप की। जो डरपोक अथवा शंति प्रिय छात्र-छात्राएं थीं, वे क्लास छोड़कर अपने-अपने आवास चली गईं। बाकी बचे छात्र-छात्राएं दो खेमे में बंट चुकी थी। हॉकी स्टिक्स, क्रिकेट के बल्ले और स्टम्प्स, बेल्ट तथा साइकिल के टूटे चेन से सब सजने लगे थे।
शैल ने तब चालाकी से डरपोक छात्र-छात्राओं के रूप में अपने दल के आधे से अधिक लोगों को कॉलेज परिसर से पहले ही बाहर भेज दिया और उन्हें परिसर के आसपास तैयार रहने का निर्देश दिया।
इतना करते करते संध्या के चार बज ही गए। अजय का गु्रप कॉलेज परिसर से बाहर निकलकर वहीं पास में ही जम गया।
बाद में शैल गु्रप के छात्र और छात्राओं ने निकलना शुरू किया। सबसे आगे रजनी अपनी तीन-चार सहेलियों के साथ निकली। वह ज्योंही कॉलेज परिसर के गेट से निकलकर दस कदम दूर गई कि अजय ने ललकारते हुए कहा, ‘‘देखते क्या हो अवध अब ? पकड़ो उस साली रजनी को और एकदम नंगी कर दो।’’
‘‘कौन माई का लाल है जो रजनी को छू लेगा।’’ तभी पीछे से ललकारते हुए शैल ने कहा था।
लेकिन अवध को तो पुराना अहं था। उसको या उसके अध्यक्ष अजय सिंह को क्या पता था कि शैल इस बीच अपने गु्रप के लोगों को लड़ने-भिड़ने की अच्छी ट्रेनिंग दे चुका था। छात्राओं को जूडो-कराटे के दांव-पेच सिखा चुका था। वह तो शान से फुफकारता हुआ रजनी के पास गया और सीधे उसके सलवार के नाड़े में हाथ डाल दिया। परन्तु दूसरे ही क्षण अवध चीत्कार करता सा दो-तीन फीट पीछे हटकर गिर पड़ा था और अपनी दोनों हथेलियों को जांघों के बीच रखकर छटपटाने सा लगा था। रजनी ने अपने घुटने से उसकी जांघों के बीच जैसे वज्र प्रहार कर दिया था। तभी अजय सिंह शेर की तरह रजनी पर झपटा था कि हठात मधुमिता ने उछलकर एक हवाई किक उसकी छाती पर दे डाली, तो अजय लड़खड़ा सा गया था।
फिर तो दोनों ओर से जमकर धींगा-मुश्ती होने लगी थी। अजय के ग्रुप में तब अधिक छात्र-छात्राएं थी, इसलिए वह कुछ भारी पड़ने लगा था। तभी हाथ में हॉकी स्टीक ले तीर की तरह अजय ग्रुप के चक्रव्यूह को भेदता सा शैल उसके पास जाकर दनादन उसपर हॉकी स्टीक बरसाने लगा था। यह देख शैल ग्रुप का उत्साह एकदम बढ़ गया था।
‘‘मारो-मारो रे सालों को छठी का दूध याद दिला दो।’’ दनादन हॉकी स्टीक चलाते शैल अपने ग्रुप को ललकारता भी जाता था। फिर तो देखते ही देखते पासा एकदम पलट गया था। अजय ग्रुप के पांव उखड़ चले थे। तभी एक जोरदार हॉकी स्टीक शैल के हाथ से ऐसा अजय के सर पर लगा कि उसका सर फूट गया और वह सर पकड़कर बैठ गया। शैल ग्रुप ने अब साइकिल चेन से वार करना शुरू किया। फिर तो अजय ग्रुप एकदम पीछे मुड़कर भाग खड़ा हुआ और शैल ग्रुप ने उन्हें खदेड़-खदेड़ कर मारना शुरू किया। इतने में दनदनाती हुई तीन-चार गाड़ियों में पुलिस आ पहुंची थी। प्रिंसिपल ने शायद पुलिस को फोन कर दिया था।
पुलिस ने आते ही लाठी भांजना शुरू कर दिया और पकड़-पकड़कर छात्रों को गाड़ी पर लादना शुरू किया। महिला पुलिस भी आ धमकी थी। उन्होंने छात्राओं को एकदम शांत हो जाने के लिए विवश कर दिया था।
ऐन समय पर एम्बुलेंस भी आ गया। पुलिस ने तब घायल छात्र-छात्राओं को उस पर लादना शुरू किया। इस बीच पुलिस को देखते ही मधुमिता ने ब्लेड से कई आड़ी-तिरछी चीरा रजनी के सलवार में लगाकर उसे अर्द्धनग्न सा कर डाला। जम्फर का भी वही हाल किया। बाल तो धींगा-मुष्ती में बिखर ही गए थे। इसके बाद रजनी जोर-जोर से कराहने लगी, ‘‘मां री मां, मुए ने एकदम नंगा ही कर डाला। मार मार कर उन दोनों ने मुझे मुआ ही डाला’’ वह पुलिस अधिकारी को देख रोने लगी।
इतने में मीडियावाले भी आ पहुंचे और अर्द्धनग्न रजनी के दनादन फोटो उतारने लगे थे।
अंत में हुड़दंग करने वाले सभी छात्र-छात्राओं को पुलिस दल खदेड़कर तथा घायलों को एम्बुलेंस एवं गाड़ियों में लादकर उन्हें ले अस्पताल चल पडा था।
फिर तो घंटे भर के बाद ही इलेक्ट्रॉनिक मीडिया राजधानी समाचार ने नग्नप्राय रजनी को तथा अन्य घायलों को दिखा-दिखाकर समाचार देना शुरू किया। मीडियावालों ने रजनी से घटना के सम्बन्ध में पूरा बयान भी लिया। रजनी ने अवध द्वारा अभद्र व्यवहार किए जाने तथा अजय और अवध ग्रुप द्वारा उन्हें एकदम नंगी करने के प्रोग्राम को बताते हुए कहा कि अगर शैल भाई न रहते तो वे दरिन्दे मुझे सबके सामने एकदम नंगी कर देते। मधुमिता और शैल ने रजनी की बातों का पूर्ण समर्थन किया, जबकि अजय और अवध ने इन्कार किया। फिर तो सारे शहर में हलचल मच गई थी। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के नेतागण भागे-भागे अस्पताल आकर वस्तुस्थिति का जायजा लेने लगे और उसे अपने पक्ष में ढालने की चेष्टा करने लगे थे। संतराम व्रिदोही जी तो इस वारदात के रिंग मास्टर थे, वह भला कैसे चूकते। समाचार पत्रों में एक से बढ़कर एक वक्तव्य देकर उन्होंने राजनैतिक धमाल मचाना शुरू कर दिया। शैल का परिचय उन्होंने जन-जागरण पार्टी के युवा विंग के एक समर्पित कार्यकर्ता के रूप में देना शुरू कर दिया था।
शैल कुमार शैल, इस तरह घंटे भर के अंदर हीरो बन चुका था। शहर के सभी युवाओं की जुबान पर उसका नाम चढ़ चुका था। पुलिस ने भी यद्यपि दोनों ओर से इस्तगासा दर्ज किया था। लेकिन लड़की के साथ अभद्र व्यवहार करने, उसे मारपीट कर नंगी करने के प्रयास के कारण अजय सिंह और अवध सिन्हा को ही असल दोषी मान रही थी। वैसे रजनी और अवध के बीच कोई अफेयर नहीं था, पर जबरदस्ती तो अवश्य थी। अवध रजनी को बराबर छेड़ ही बैठता था। वह बेचारी चुपचाप सह लेती थी। लेकिन अवध को तब क्या पता था कि रजनी अब बहुत बदल चुकी है। वह हठात चप्पल चला देगी। एक तो बेचारा पिट भी गया और ऊपर से बदनाम हो गया सो अलग।
डॉ देवेन्द्र नाथ भारती तब एक जरूरी मीटिंग में थे। मीटिंग में यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर भी आए थे। मीटिंग के बाद डिनर पार्टी भी थी। मीटिंग समाप्ति के बाद ज्योंही वह डाइनिंग टेबुल पर आए कि लोगों को चाव से टीवी पर राजधानी समाचार देखते देखा। उन्होंने भी देखा और देखकर चौंक से पड़े। शैल को घायल अवस्था में उन्होंने देखा। बाद में वह पूरी घटना से अवगत हुए। देखने वाले जहां अजय और अवध को भला-बुरा कह रहे थे, वहीं शैल की तारीफ कर रहे थे। लेकिन देवेन्द्रनाथ को दाल में कुछ काला नजर आ रहा था। वे शैल की फितरत से वाकिफ जो थे। अकारण शैल ने उस लड़की की अस्मत की रक्षा के लिए इतना बड़ा खतरा मोल लिया, इसे वह मानने के लिए तैयार नहीं थे। परदे के पीछे जरूर सीन कुछ दूसरा होगा। खैर, डिनर खत्म होने पर वह घर आए। संध्या रानी उनकी प्रतीक्षा कर ही रही थी।
‘‘राजधानी समाचार में अपने लाडले की करतूत देखी भी है तू ने क्या संध्या रानी ?’’ पत्नी पर नजर पड़ते ही उन्होंने प्रश्न किया था।
‘‘क्यों ? मैंने न केवल समाचार देखा, तुरंत मोबाइल से सम्पर्क कर शैल से पूरा वृत्तांत भी जान चुकी हूं।’’
‘‘फिर अपने बेटे की कुछ तारीफ की या नहीं?’’
‘‘क्यों, मेरे बेटे ने कौन सी हेठी का काम किया है, जिसके लिए तुम व्यंगबाण छोड़ रहे हो। किसी लड़की की इज्जत-आबरू बचाना क्या कोई हेठी का काम है?’’
‘‘ओह मैं तो उसका हाल पूछ रहा हूं। सर फूटा, हाथ-पैर टूटा या बस मामूली सी खरोंच है। हाथ-पैर और सर पर तो काफी बड़ा बैंडेज बंधा है।’’
‘‘तुम्हारी तो बातें ही निराली है। शैल को मैंने भरपूर अपनी छाती का दूध पिलाया है। कोई डब्बेवाला दूध पीकर वह बड़ा नहीं हुआ है। उसका सर फोड़ना या हाथ-पैर तोड़ना कोई आसान काम नहीं है। हां, हल्की-सी चोट-खरोंच अवश्य उसे लगी। वह तो अपने केस को मजबूत बनाने के लिए उसने स्वयं अपने सर और हाथ-पैर में ब्लेड से चीरा लगा लिया है और बैंडेज बंधवा लिया है। उसने कहा, ‘‘मां आप आश्वस्त रहें। आपका बेटा कभी आप के दूध को लज्जित नहीं होने देगा।’’ संध्या रानी ने दो टूक सा जवाब अपने पति को दिया था।
‘‘चलो मान लिया कि तुम्हारा लाल बहुत बहादुर है। लेकिन वह लड़की कौन है? क्यों तुम्हारे लाल ने उसके लिए इतना बड़ा झगड़ा मोल लिया? इसके पीछे कुछ राज है क्या ?
‘‘क्या राज रहेगा ? अजी अधिक से अधिक यही कहोगे न कि उस लड़की से शैल का सम्बन्ध है। तो मैं क्या करूं? शैल नौजवान है, वह लड़की नवयुवती, अगर उनके बीच कोई अफेयर होगा भी तो हम क्या कर सकते हैं?’’
‘‘कमाल बातें करती हो संध्या रानी। हमने उसे कॉलेज पढ़ने भेजा है अथवा प्रेम-मुहब्बत करने या कोई अफेयर चलाने के लिए ?’’
‘‘ओह, लगता है जनाब अपनी बातें भूल गए हैं। जरा बताओगे भी कि तुमने पहले मेरी इज्जत ली थी। मेरे बदन का इतिहास-भूगोल जाना था अथवा पहले मुझसे शादी की थी ?’’
संध्या रानी के इस वार ने देवेन्द्रनाथ को कुछ देर के लिए एकदम लाजवाब कर दिया थ। कई मिनटों तक वह जैसे बगलें झांकने से लगे थे।
‘‘संध्या रानी, अरे वह तो मेरी मानवीय दुर्बलता थी न।’’
‘‘अच्छा-अच्छा! वह तुम्हारी मानवीय दुर्बलता थी। तो क्या तुम्हारे नौजवान बेटे में वह मानवीय दुर्बलता नहीं हो सकती है ? जबकि आज भी हममें वह मानवीय दुर्बलता विद्यमान है। आज भी हमारी एक ही शैय्या है। फिर कैसे तुम जवान बेटे में आज के खुले वातावरण में मानवीय दुर्बलता नहीं रहने की बात कहते हो ?’’
‘‘चलो मैंने हार मान ली। परन्तु उस मानवीय दुर्बलता के बाद झट मैंने तुमसे शादी कर ली थी।’’
‘‘सच पूछो तो वह डर से। तब कोई गर्भ निरोधक औषधि थी ही नहीं और न कोई उपकरण ही था। इसलिए हम उस मानवीय दुर्बलता को कवर करने के वास्ते शादी करने के लिए मजबूर हो गए। आज जमाना बहुत बदल गया है। कई प्रकार की गर्भ निरोधक औषधियां और उपकरण इजाद हो चुके हैं। वैसे भी आज तक कोई लड़की यह कहने आई है कि तेरे बेटे ने मेरे साथ बलात्कार किया है अथवा मेरी गोद भर दी है अथवा कोई लड़की गोद में नवजात शिशु लिए आई है यह कहती कि लो अपने पोते या पोती को संभालो। यह तेरा खून है। मेरे दामन को तेरे बेटे ने दागदार कर दिया। अब मैं कहां जाऊंगी? लो मुझे बहू के रूप में स्वीकार करो।’’
‘‘ओह संध्या रानी। आज की लड़कियां क्यों इस तरह की शिकायतें लेकर आएंगी? विज्ञान ने आज उन्हें तुम्हारे ही शब्दों में अनेक गर्भ निरोधक औषधियां और उपकरण दिए हैं। भूल-चूक होने पर अनवान्टेड-72 जैसी औषधि भी है। इसी से न आजकल लड़कियां उच्छृंखल और बोल्ड हो गई हैं।’’
‘‘तो तुम मर्दो की छाती क्यों फटने लगी है? जब तुम मर्द लोग भंवरे के समान उड़-उड़कर कली-कली का रस चूसते थे, तब बड़ा आनन्द आता था। आज जब लड़कियां विज्ञान के सहारे कुछ स्वच्छंद होने लगी हैं तो तुम मर्दो को क्यों जलन होने लगी है?
‘‘माफ करना संध्या रानी। मैं यह भूल ही गया था कि तुम महिला समाज की एक पदाधिकारी हो। चलो तुम जो कहती हो उसे मैं मान लेता हूं। तुम्हारा लाडला बिल्कुल ठीक है। मैं ही गलत था।’’
‘‘शैल मेरा लाडला, और तुम्हारा कोई नहीं ?’’
‘‘मैंने कब कहा कि शैल मेरा कोई नहीं है। अलबत्ता वह तेरा लाडला है। मेरा तो केवल बेटा भर है।’’
‘‘थैंक यू। वह भी सही। शैल तुम्हारा केवल बेटा है, परन्तु मेरा लाडला है। चलो अब जरा सरको भी। मुझे भी लेटने की जगह दो। समूचा पलंग घेरकर सोओगे क्या?’’ संध्या रानी बलपूर्वक उन्हें सरकाती बोली थी।

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