नई डिग्रियां (भाग-7)
अपने पिता डॉ देवेन्द्र नाथ भारती की झिड़की खाकर शैल जिस वक्त संतराम के पास गया था, उस समय संतराम की जन-जागरण पार्टी मृतप्राय अवस्था में थी। दरअसल संतराम की यूज एंड थ्रो की नीति ने उनकी पार्टी के अच्छे-अच्छे समर्पित कार्यकर्ताओं को भी पार्टी छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया था। कभी समय था, जब संतराम विद्रोही की इस क्षेत्र में तूती बोलती थी। उनकी पार्टी से चार सांसद तथा दर्जनों विधायक जीते थे। यह अलग बात थी कि तब सत्ताधारी दल का पूर्ण बहुमत राज्य एवं केन्द्र में भी था। इसीलिए संतराम तब केवल एक क्षेत्रीय दल के मुखिया भर रह गए थे। फिर भी उन्होंने जिस तरह अपने आर्थिक लाभ के लिए पार्टी को चलाना शुरू किया तथा अपने विधायकों एवं सांसदों के साथ दुव्यर्वहार किया कि वे सभी टूटते चले गए। कई सत्ताधारी दल के साथ हो गए, तो कुछ मुख्य विपक्षी दल के साथ जा मिले और संतराम की जन-जागरण पार्टी एक तरह से धराशायी हो चुकी थी।
ऐन वक्त शैल तब देदीप्यमान नक्षत्र की तरह प्रकट हुआ था। उस स्वर्ण को उसने पहले कॉलेज की आग में तपाया तो वह खरा कुंदन निकला। संतराम ने तब फिर शैल के सहारे अपनी पार्टी को पुनर्जीवित करने एवं जुझारू बनाने की चेष्टा शुरू कर दी थी। इस क्रम में वह यह भी भूल गया था कि शैल कॉलेज पढ़ने के लिए आया है। वह एक विद्वान एवं विदुषी माता-पिता का पुत्र है। अपने स्वार्थ के लिए उसने एक तरह से शैल को कर्त्तव्यच्युत करना शुरू किया। उसे राजनीति का नशा पिलाया। फलतः संतराम की जन-जागरण पार्टी तो पुनर्जीवित होकर सांस अवश्य लेने लगी थी, परन्तु शैल परीक्षा में फेल हो गया और इस कारण उसे पिता की झिड़की खानी पड़ी थी। फिर भी शैल गृहत्याग नहीं करता, पिता की झिड़की खाकर पढ़ने की ओर उन्मुख हो जाता, परन्तु उसके उस विद्वान पिता ने परोक्ष रूप से उसकी मां को मोटी सी गाली दे दी थी। इसी से खिन्न होकर शैल ने गृहत्याग का संकल्प इस प्रतिज्ञा के साथ किया था कि वह अपने बड़े भाई और पिता से भी ऊंची डिग्री प्राप्त कर ही घर वापस आएगा एवं तब गृहस्थ जीवन में प्रवेश करेगा। लेकिन तब गृहत्याग के बाद वह जाता कहां ? उसके और उसके परिवार के अनेकं रिश्तेदार और हितैषी तथा मित्र थे। लेकिन उसे तो अपने भरोसे ही सब कुछ करना था। इसलिए ही वह संतराम के पास गया था।
शैल का संतराम के पास पहुंचना बिल्ली के भाग्य से छींका टूटने के समान था। उन्होंने शैल को सम्पूर्ण रूप से अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करने की योजना बना ली थी।
‘‘महाशय जी, मुझे डिग्री भी हासिल करनी है। ऊंची से ऊंची डिग्री। मेरे पिता, बड़े भाई तथा मां भी डॉक्टरेट की डिग्री हासिल कर चुकी हैं। मैं भी उन्हीं के समान अथवा उनसे भी ऊंची डिग्री हासिल कर घर लौटने का संकल्प ले चुका हूं। अतः पढ़ना भी जरूरी है।’’ शैल ने तब संतराम से कहा था।
‘‘बरखुर्दार मैं पहले ही कह चुका हूं कि आज की यह शिक्षा पद्धति लार्ड मैकाले द्वारा चालित शिक्षा पद्धति है, जबकि प्रजातंत्र में जनप्रतिनिधित्व का सर्टिफिकेट पाना किसी भी विद्यालय, महाविद्यालय अथवा नामी-गिरामी यूनिवर्सिटियों द्वारा प्रदत्त डिग्री से बढ़कर है। सच पूछो तो राजनैतिक क्रियाकलाप, राजनैतिक आंदोलन और लड़ाई विश्व के खुले विश्वविद्यालय में राजनीतिशास्त्र, समाजशास्त्र, दर्शनशास्त्र, अर्थशास्त्र, कूटनीतिशास्त्र वगैरह की पढ़ाई है। इस विश्वविद्यालय द्वारा प्रदत्त डिग्रियां किसी को विधायक अथवा सांसद बनाती हैं। यह ऐसा प्रमाणपत्र है, जो किसी भी यूनिवर्सिटी द्वारा प्रदत्त स्नातक की डिग्री से भी ऊंची है। उसी तरह किसी राज्य या केन्द्र में मंत्री होना मास्टर की डिग्री से ऊंची है और राज्य अथवा केन्द्र में कोई प्रतिष्ठित विभाग का मंत्री सह अपने दल अथवा पार्टी का सर्वेसर्वा होना, चाहे वह दल अथवा पार्टी छोटी ही क्यों न हो, वह डिग्री किसी भी विषय में डॉक्टरेट से बढ़कर है। मान लीजिए बरखुर्दार, आपके पिता एवं भाई अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट की उपाधि ले चुके हैं और अगर कहीं आप राज्य अथवा केन्द्र में वित्त मंत्री अथवा उप वित्त मंत्री अथवा राज्य वित्त मंत्री ही बन गए तो आप ही बताइए उनकी डिग्री को आपने फलांग दिया अथवा नहीं ? इसीलिए बरखुर्दार मेरा कहना मानिए, आप तन-मन से राजनीति में पिल पड़िए, फिर देखिए कि साल भर के अंदर ही जनतंत्र द्वारा प्रदत्त डिग्री आपको प्राप्त हो जाती है या नही? मंत्री न भी बनें, विधायक तो अवश्य ही बन जाएंगे। मतलब एमए न सही, बीए तो पास कर ही जाएंगे। हालांकि मेरा अनुमान है कि एमए ही पास कर लेंगे।’’ संतराम ने तब यह पाठ पढ़ाया था उसे।
उस पाठ को पढ़कर वह मंत्री तो अवश्य बन गया, मतलब एमए की डिग्री हासिल कर ली, परन्तु स्थायित्व पर संतराम की नीयत और राहू दृष्टि से भारी संदेह था। वह सोचने लगा कि सुरेखा ठीक कहती थी कि संतराम बहुत बड़ा फ्रॉड किस्म का आदमी है तथा उसने सदा यूज एंड थ्रो की नीति अपनाई है। बस केवल एक ही भरोसा है कि उसके साथ और चार विधायक हैं।
खैर ग्रामीण विकास विभाग का कार्यभार संभालते ही शैल ने उस विभाग की कार्य संस्कृति एकदम बदल दी थी। यों तो ग्रामीण विकास विभाग को मोटी कमाई का विभाग कहा जाता है, लेकिन वहां कार्य भार संभालते ही उसने लूट-खसोट की नीति को सख्ती से रोक दिया। इसके पहले आधी से अधिक विकास योजनाएं कागज पर ही पूरी हो जाती थीं और उसकी राशि, जो जनता की गाढ़ी कमाई होती है, की निकासी भी हो जाती थी, उन्हें उसने एकदम रोक दिया।
‘‘शैलजी, अधिक साधुपन चुनाव के वक्त आपको और आपके साथ पार्टी को भी ले डूबेगा। चुनाव के वक्त धन की बड़ी आवश्यकता होती है। इसीलिए कार्य संस्कृति को नहीं छेड़ते तो वही अच्छा होता।’’ मधुमिता ने तब एक दिन शैल से कहा था।
स्पष्ट था कि संतराम ने मधुमिता से यह उसे कहलवाया था। क्योंकि अनेक अफसर संतराम के हितैषी अथवा बराबर भुगतान करने वाले थे। अतः उन्होंने ही संतराम को यह कहने के लिए बाध्य किया था।
‘‘मधुमिता जी, अच्छा होता, आप दूसरे मंत्री के विभाग में टांग नहीं अड़ाती। मैं अपनी समझ से ठीक कर रहा हूं।’’ एक छोटा-सा जवाब शैल ने दिया था, परन्तु वह जवाब तो मधुमिता एवं संतराम के दिल में तीर के समान लगा था तथा वे शैल को सबक सिखाना चाहने लगे थे।
यों तो शैल भी जानता था कि पद पर रह कर धन अर्जित करना ही पड़ेगा, वर्ना मौजूदा प्रजातांत्रिक पद्धति में पद पर बने रहना मुश्किल है। लेकिन उसने कागजी कारोबार को फिर भी बंद कर दिया। इसके अलावा अपने विभाग का कार्य अधिकतर नौजवानों से कराना शुरू कर किया। साथ के चारों विधायक उसके सलाहकार थे। इस तरह युवा वर्ग में उनकी पकड़ बहुत मजबूत होने लगी थी। इसके अलावा उसने अपने उस फाइनेंसर को सदा खुश रखने की चेष्टा की। इससे शैल का प्रभाव बढ़ने लगा था।
शैल का यह बढ़ता प्रभाव संतराम की आंखों को वक्र करने लगा था। किसी न किसी तरह वह शैल के पंख कतरने की चेष्टा में लग गया था। वह अपने आदमियों से शैल पर भ्रष्टाचार में लिप्त रहने, अन्य अनैतिक काम करने, अवैध ढंग से धन इकट्ठा करने वगैरह का आरोप लगवाने लगा था। सच पूछा जाए तो विधानसभा चुनाव के वक्त से ही संतराम इस तरह की कुचेष्टा करने लगा था। उसने तब शैल के पक्षधर उम्मीदवारों को किसी न किसी बहाने टिकट ही नहीं दिया था।
‘‘बरखुर्दार, पार्टी के पुराने और समर्पित कार्यकर्ताओं का भी ध्यान तो रखना पड़ेगा न ? फिर मैं कहां कहता हूं कि आपके द्वारा प्रस्तावित उम्मीदवार खरे, कर्मठ तथा विधायक बनने योग्य नहीं हैं ? उनपर भी ध्यान रखा जाएगा। श्रीमती राजश्री शर्मा एवं नंदलाल वर्माजी को तो मेरा विचार है कि उन्हें आने वाले लोकसभा चुनाव में चांस देने की चेष्टा की जाएगी। जहां तक रजनी मेहता का सवाल है, तो किसी अन्य जिले से उम्मीदवार बनाया जा सकता है। परन्तु हमने जो उम्मीदवारों की लिस्ट बनाई है उसमें रद्दोबदल की कोई गुंजाइश नहीं है। रद्दोबदल आत्मघाती भी हो सकता है।’’ संतराम ने कहा था।
रजनी का जो कार्यक्षेत्र था, वहां से संतराम ने अपनी बेटी को उम्मीदवारी का टिकट दिया तथा दूसरे क्षेत्र से अपनी पत्नी को। रजनी ने यह देखकर टिकट लेने से इन्कार कर दिया था, परन्तु शैल के कहने पर मधुमिता की सफलता के लिए जी जान से जुट गई थी। रजनी की मेहनत की बदौलत मधुमिता जीत भी गई, जबकि उसकी पत्नी हार गई थी।
संतराम ने इस तरह तब ही शैल को दरकिनार करना चाहा था, परन्तु उसके साथ चार और विधायक जो एकदम चिपके थे, इसी कारण वह शैल को दरकिनार कर नहीं पाया था। उसके बाद उसने यह नई चाल चली और अपने आदमियों द्वारा शैल के खिलाफ एक से एक आरोप लगवाने शुरू कर दिए थे। फलतः आपस में रस्साकशी सी चलने लगी थी।
संतराम के इन कृत्यों से शैल की छठी इन्द्रिय जाग उठी थी। भविष्य में खतरा देख उसने एक नये दल ‘‘छात्र-युवा संघर्ष मोर्चा’’ की नींव डाली। दल का विधिवत रजिस्ट्रेशन उसने कराया। संतराम इस पर लाल-पीले भी हुए और कहा, ‘‘बरखुर्दार आपके इस काम से आपकी विधायकी तक जा सकती है। मंत्रिपरिषद् से निलम्बन तो अवश्यम्भावी है।’’
‘‘एक तो महाशय जी वह दल कोई अलग न होकर अपने ही दल की युवा शाखा है। फिर उस दल का मैं अथवा मेरे चारों विधायक साथी न कोई पदाधिकारी हैं और न सदस्य ही। उस छात्र-युवा संघर्ष मोर्चा के श्री नंदलाल वर्मा जी अध्यक्ष हैं, श्रीमती राजश्री शर्मा सचिव, सुश्री रजनी मेहता उपसचिव तथा इसी तरह अन्य पदाधिकारी हैं। अतः एंटी डिफेक्शन एक्ट हम पर लग ही नहीं सकता है। फिर भी आप स्वतंत्र हैं जो चाहें कर सकते हैं।’’ शैल ने भी तब संतराम को चैलेंज दे डाला था।
‘‘बरखुर्दार, जन-जागरण पार्टी का अध्यक्ष मैं और उसकी नई शाखा खोलें आप, वह भी मेरी अनुमति के बगैर ? आप क्या मुझे बच्चा समझ बैठे हैं ? सुन लीजिए, मेरे एक इशारे पर मुख्यमंत्री आपको मंत्रिपरिषद् से बर्खास्त कर सकते हैं।’’ संतराम ने धमकी दी थी।
शैल ने तब संतरामजी की धमकी के बारे में अपने साथियों से कहा। सभी ने मिलकर तब इस पर विचार-विमर्श किया और दूसरे दिन शैल सहित आठ विधायक मुख्यमंत्री से जा मिले थे। उन्होंने संतरामजी की धमकी के बारे में उनको कह सुनाया और कहा, ‘‘मुख्यमंत्री जी यदि ऐसी ही कोई खिचड़ी आपके और संतराम जी के बीच पक रही है तो कोई बात नहीं। लेकिन उस हालत में सुन लीजिए हम आगे एक साथ सरकार से अपना समर्थन वापस लेने के लिए मजबूर हो जाएंगे।’’
मुख्यमंत्री श्रीधर स्वामी ने जब उन आठों को एकदम एकजुट देखा जो चौकन्ने हो गए। सालभर के अंदर लोकसभा का चुनाव भी होना था। इस हालत में सरकार अस्थिर होने से लोकसभा चुनाव में इसका गहर असर पड़ता।
‘‘आपलोगों ने यह कैसे मान लिया कि किसी मंत्री के कहने से मैं अपने दूसरे सहयोगी मंत्री को बर्खास्त कर दूंगा ? वैसे शैलजी भी ऐसा कुछ नहीं करें, जिससे सरकार की बदनामी हो या सरकार अस्थिर हो।’’ मुख्यमंत्री ने तब उन्हें कहा था।
इस तरह मुख्यमंत्री ने तब उन्हें शांत कर दिया, परन्तु उसके बाद उन आठों की एकता तोड़ने की चेष्टा भीतर ही भीतर काफी जोर शोर से श्रीधर स्वामी और संतराम करने लगे थे।
इस तरह जब मुख्यमंत्री श्रीधर स्वामी तथा उपमुख्यमंत्री संतराम विद्रोही शैल को कमजोर करना चाह रहे थे, तब शैल द्वारा नवगठित छात्र-युवा संघर्ष मोर्चा को अधिक से अधिक शक्तिशाली करने और चुनाव कमीशन द्वारा मान्यता प्राप्त कराने की चेष्टा परोक्ष रूप से काफी जोर शोर से की जा रही थी। छात्र-युवा संघर्ष मोर्चा द्वारा बड़ी बड़ी रैलियों का आयोजन किया जाने लगा था। जन-समस्याओं को लेकर सभाएं, धरना-प्रदर्शन इत्यादि अनेक तरह के आंदोलन किए जा रहे थे और लोगों को यह बताया जाने लगा था कि जब तक युवा पीढ़ी के हाथ में सत्ता की बागडोर नहीं आएगी, तब तक इन समस्याओं का समाधान नहीं हो पाएगा। वे दहाड़ते हुए कहने लगे थे कि आने वाले लोकसभा एवं विधानसभा के चुनाव में युवा वर्ग को चुनकर इसका मुंहतोड़ जवाब देना है।
एक तरफ इस तरह संगठन और मोर्चा के प्रचार-प्रसार पर ध्यान दिया जा रहा था तो दूसरी ओर चुनाव आयोग से मान्यता प्राप्त करने की चेष्टा जी जान से की जा रही थी।
अंततोगत्वा साल बीत गया और लोकसभा के चुनाव की घोषणा भी हो गई। फिर तो सभी पार्टियों की बैठकें होने लगीं। किसी भी राष्ट्रीय या क्षेत्रीय पार्टी में अब वह दम कहां रहा कि अकेले अपने बलबूते पर चुनाव लड़े। अब तो गठबंधनों का दौर है। सभी गठबंधन करने के लिए सहयोगी दलों को तलाशने लगे थे। इस क्रम में श्रीधर स्वामी की तत्कालीन सत्ताधारी पार्टी और जन-जागरण पार्टी में फिर गठबंधन हुआ और उसके तहत दो सीटें लोकसभा की जन-जागरण पार्टी को मिली। शैल ने तब संतराम को याद दिलाया कि गत विधानसभा चुनाव में पार्टी ने निर्णय लिया था कि लोकसभा के चुनाव में श्रीमती राजश्री शर्मा और श्री नंदलाल वर्मा को टिकट दिया जाएगा। अतः उन्हें टिकट दिया जाना चाहिए।
‘‘बिल्कुल नहीं। बरखुर्दार उन्होंने नया राजनैतिक मोर्चा छात्र-युवा संघर्ष मोर्चा बना लिया है और उसकी मान्यता के लिए सचेष्ट हैं, इसलिए उन्हें टिकट नहीं दिया जाएगा।’’ संतराम ने कहा था।
संतराम ने अंत में एक सीट पर अपने पुत्र राजेश को और दूसरी सीट पर अपनी पत्नी सावित्री देवी को टिकट दिया और पुरजोर ढंग से चुनाव के मैदान में कूद पड़ा था। इधर बमोकाबले उनके छात्र युवा-संघर्ष मोर्चा की ओर से एक सीट पर श्रीमती राजश्री शर्मा और दूसरी पर श्री नंदलाल वर्मा को खड़ा किया गया।
चूंकि तब तक चुनाव आयोग से छात्र-युवा संघर्ष मोर्चा को मान्यता प्राप्त नहीं हुई थी, इसीलिए श्रीमती राजश्री शर्मा और श्री नंदलाल वर्मा निर्दलीय उम्मीदवार ही माने गए थे, जबकि महेंद्र किशोर, श्रीधर स्वामी एवं संतराम की पार्टियां मान्यता प्राप्त थीं। अतः मान्यता प्राप्त करने के लिए छात्र-युवा संघर्ष मोर्चा को दो में से कम से कम एक सीट अवश्य जीतना था, जबकि अन्य तीन ऐसी सीटों से वोट प्रतिशत प्राप्त करने के लिए मोर्चा वहां से भी चुनाव लड़ रही थी, जिन सीटों पर कम से कम उनके उम्मीदवारों की जमानतें जब्त न हों।
जब मुकाबला पुरजोर चलने लगा, तब न सिर्फ श्रीधर स्वामी और संतराम विद्रोही को, बल्कि महेंद्र किशोर को भी लगने लगा कि शैल के नाम की आंधी सी बनती जा रही है। यद्यपि शैल और उसके विधायक साथी खुलकर प्रचार-प्रसार में हिस्सा नहीं ले पा रहे थे, फिर भी छात्र-युवा संघर्ष मोर्चा की तूती बोलने लगी थी।
अंत में वोट पड़े। मतगणना भी हुई और अपेक्षा के अनुरूप छात्र-युवा संघर्ष मोर्चा के दोनों उम्मीदवार श्रीमती राजश्री शर्मा और श्री नंदलाल वर्मा चुनाव जीत गए। बाकी तीन उम्मीदवार भी अपनी-अपनी जमानत बचाने में सफल रहे।
श्रीमती राजश्री शर्मा ने संतराम की पत्नी सावित्री देवी को एक लाख से भी अधिक वोटों से हराया था। श्री नंदलाल वर्मा ने भी महेंद्र किशोर की पार्टी के उम्मीदवार को लगभग 38 हजार वोटों से हराया था। संतराम के पुत्र राजेश की तो जमानत भी जब्त हो गई थी।
शैल की इस सफलता से संतराम के साथ श्रीधर स्वामी भी खार खाए बैठे थे और किसी तरह उसे बदनाम कर मंत्रिपरिषद् से बर्खास्त करने का षड्यंत्र रचने लगे। इसके लिए उन दोनों ने शैल के साथी विधायकों में से एक को मंत्री पद और अन्य को तरह-तरह का प्रलोभन देना शुरू किया। परन्तु शैल के वे साथी विधायक उसके प्रति समर्पित थे। उन्होंने तब आपस में मिलकर फैसला लिया कि सरकार को अपदस्थ कर देना चाहिए, वर्ना श्रीधर स्वामी एवं संतराम उन्हें कहीं न कहीं फंसा सकते हैं।
अंत में वही हुआ। दूसरे ही दिन सुबह शैल ने मंत्री पद से अपना इस्तीफा मुख्यमंत्री श्रीधर स्वामी के पास भिजवा दिया। श्रीधर स्वामी ने तब झट से संतराम को बुलवाया। दोनों ने इसपर विचार किया। वे तो यह चाहते ही थे। इसलिए शैल के इस्तीफे को झट से स्वीकार कर महामहिम राज्यपाल महोदय के पास स्वीकृति की मुहर लगाने के लिए भेज दिया।
श्रीधर स्वामी इसके बाद हेलीकॉप्टर से राज्य के एक सुदूर क्षेत्र में, जहां से कभी उनकी पार्टी का कोई उम्मीदवार नहीं जीता था, चले गए। वहां उनका नागरिक अभिनंदन होना था। इस बार वह वहां पर अपनी जड़ जमाने में सफल हुए थे।
वहां पर उनके नागरिक अभिनंदन की कार्रवाई शुरू होने ही वाली थी कि श्रीधर स्वामी को मोबइल से खबर मिली कि जन-जागरण पार्टी के 11 विधायकों में से शैल सहित छः विधायकों ने एवं दो विशुद्ध निर्दलीय विधायकों सहित कुल आठ विधायकों ने महामहिम के समक्ष सदेह उपस्थित होकर शपथपूर्वक अपना समर्थन सरकार से वापस ले लिया है। उसके बाद वे प्रेस कांफ्रेंस में इसकी घोषणा भी कर रहे हैं।
उधर विधानसभा में विरोधी दल के नेता महेंद्र किशोर ने सरकार को बर्खास्त कर विधानसभा भंग करने की मांग रख दी। इस तरह उन्होंने श्रीधर स्वामी की सरकार की अस्थिरता का फायदा चुनाव में उठाने की चाल चल दी थी।
इन समाचारों के मिलते ही श्रीधर स्वामी ने नागरिक अभिनंदन का कार्यक्रम तुरंत स्थगित करा दिया और हेलीकॉप्टर से राजधानी की ओर उड़ चले थे। राजधानी पहुंचते ही उन्हें राजभवन का बुलावा आया, जहां महामहिम ने उन्हें अपना पक्ष रखने के लिए कहा।
‘‘महामहिम महोदय, यह हमारी सुस्थिर सरकार को अस्थिर करने की विरोधियों द्वारा रची गई चाल है। हमने अपने एक मंत्री को बर्खास्त भर किया है और उनसे इस्तीफा लिया है। इससे क्षुब्ध होकर वह मंत्री विरोधी दल वालों से जा मिला और उसी के बहकावे में आकर बाकी सात विधायकों ने समर्थन वापसी का दरखास्त दिया है। अब मैं आ गया हूं। उन्हें समझा लूंगा। बस उस मंत्री द्वारा समर्थन वापसी से हमारी सरकार अल्पमत में नहीं आ गई है। हमें मौका दिया जाए, हम अपना बहुमत सदन में सिद्ध कर देंगे।’’ श्रीधर स्वामी ने तब राज्यपाल महोदय से कहा था।
उनके इस कथन पर राज्यपाल महोदय ने उन्हें सात दिनों के अंदर सदन को आहूत कर बहुमत सिद्ध करने का आदेश दिया।
इसके बाद तो विधायकों के ‘‘हॉर्स ट्रेडिंग’’ की दर आसमान पर चढ़ गई थी। राजनैतिक सट्टेबाज एकदम सक्रिय हो उठे थे। एक-एक विधायकों के समर्थन की दर तब करोड़ों रुपए हो गई थी। फिर भी शैल के पक्षधर वे सातों विधायक शैल का साथ छोड़ने के लिए कतई तैयार नहीं थे। अंत में विधायकों का अपहरण भी करने की तैयारी होने लगी थी। परन्तु ज्योंही उसकी भनक शैल के कानों में पड़ी कि वे सातों विधायक एकदम भूमिगत हो गए थे।
इसके बाद श्रीधर स्वामी और संतराम ने गला फाड़-फाड़ कर मीडिया से कहना शुरू किया कि विपक्षवालों एवं शैलजी ने मिलकर विधायकों का अपहरण कर लिया है। उन्हें मुख्यमंत्री से मिलकर अपना दुख-दर्द कहने नहीं दिया जा रहा है, क्योंकि मुख्यमंत्री ने घोषणा कर रखी है कि अपने समर्थक हर विधायक का दुख-दर्द वह दूर करने के लिए कृतसंकल्प हैं। यदि वे विधायक मुख्यमंत्री से मिलते, तो तुरंत अपना विचार बदल देते इसलिए उन्हें मुख्यमंत्री से मिलने नहीं दिया जा रहा है।
उसके बाद कुछ ही देर के अंतराल पर एक प्रेस कांफ्रेंस और बुलाई गई। उसमें उन सातों विधायकों ने उपस्थित होकर कहा कि मुख्यमंत्री उनका अपहरण कराना चाह रहे थे, इसीलिए वे भूमिगत हैं तथा उन्होंने पुनः सरकार से समर्थन वापसी की घोषणा की।
उस प्रेस कांफ्रेंस के बाद श्रीधर स्वामी सरकार के मंत्रिपरिषद् की आपात बैठक हुई, जिसमें सर्वसम्मति से मंत्रिमंडल का इस्तीफा देने की बात तय हो गई। फिर तो दूसरे दिन साढ़े दस बजे ही राजभवन जाकर श्रीधर स्वामी ने अपने मंत्रिमंडल का इस्तीफा महामहिम राज्यपाल महोदय को सौंप दिया, जिसे महामहिम ने मंजूर कर लिया एवं केन्द्र सरकार से सलाह करने के बाद विधानसभा भंग करने की सिफारिश भी कर दी।
अंत में अन्य प्रक्रियाएं पूरी कर विधानसभा भंग कर दी गई थी। राज्य में राष्ट्रपति शासन लग गया था। विधानसभा के चुनाव हुए लगभग सवा चार साल हो भी गए थे। अतः सभी अब फिर से चुनाव की घोषणा की प्रतीक्षा और अपनी-अपनी शक्ति बढ़ाने में लग गए थे।
ऐन वक्त शैल तब देदीप्यमान नक्षत्र की तरह प्रकट हुआ था। उस स्वर्ण को उसने पहले कॉलेज की आग में तपाया तो वह खरा कुंदन निकला। संतराम ने तब फिर शैल के सहारे अपनी पार्टी को पुनर्जीवित करने एवं जुझारू बनाने की चेष्टा शुरू कर दी थी। इस क्रम में वह यह भी भूल गया था कि शैल कॉलेज पढ़ने के लिए आया है। वह एक विद्वान एवं विदुषी माता-पिता का पुत्र है। अपने स्वार्थ के लिए उसने एक तरह से शैल को कर्त्तव्यच्युत करना शुरू किया। उसे राजनीति का नशा पिलाया। फलतः संतराम की जन-जागरण पार्टी तो पुनर्जीवित होकर सांस अवश्य लेने लगी थी, परन्तु शैल परीक्षा में फेल हो गया और इस कारण उसे पिता की झिड़की खानी पड़ी थी। फिर भी शैल गृहत्याग नहीं करता, पिता की झिड़की खाकर पढ़ने की ओर उन्मुख हो जाता, परन्तु उसके उस विद्वान पिता ने परोक्ष रूप से उसकी मां को मोटी सी गाली दे दी थी। इसी से खिन्न होकर शैल ने गृहत्याग का संकल्प इस प्रतिज्ञा के साथ किया था कि वह अपने बड़े भाई और पिता से भी ऊंची डिग्री प्राप्त कर ही घर वापस आएगा एवं तब गृहस्थ जीवन में प्रवेश करेगा। लेकिन तब गृहत्याग के बाद वह जाता कहां ? उसके और उसके परिवार के अनेकं रिश्तेदार और हितैषी तथा मित्र थे। लेकिन उसे तो अपने भरोसे ही सब कुछ करना था। इसलिए ही वह संतराम के पास गया था।
शैल का संतराम के पास पहुंचना बिल्ली के भाग्य से छींका टूटने के समान था। उन्होंने शैल को सम्पूर्ण रूप से अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करने की योजना बना ली थी।
‘‘महाशय जी, मुझे डिग्री भी हासिल करनी है। ऊंची से ऊंची डिग्री। मेरे पिता, बड़े भाई तथा मां भी डॉक्टरेट की डिग्री हासिल कर चुकी हैं। मैं भी उन्हीं के समान अथवा उनसे भी ऊंची डिग्री हासिल कर घर लौटने का संकल्प ले चुका हूं। अतः पढ़ना भी जरूरी है।’’ शैल ने तब संतराम से कहा था।
‘‘बरखुर्दार मैं पहले ही कह चुका हूं कि आज की यह शिक्षा पद्धति लार्ड मैकाले द्वारा चालित शिक्षा पद्धति है, जबकि प्रजातंत्र में जनप्रतिनिधित्व का सर्टिफिकेट पाना किसी भी विद्यालय, महाविद्यालय अथवा नामी-गिरामी यूनिवर्सिटियों द्वारा प्रदत्त डिग्री से बढ़कर है। सच पूछो तो राजनैतिक क्रियाकलाप, राजनैतिक आंदोलन और लड़ाई विश्व के खुले विश्वविद्यालय में राजनीतिशास्त्र, समाजशास्त्र, दर्शनशास्त्र, अर्थशास्त्र, कूटनीतिशास्त्र वगैरह की पढ़ाई है। इस विश्वविद्यालय द्वारा प्रदत्त डिग्रियां किसी को विधायक अथवा सांसद बनाती हैं। यह ऐसा प्रमाणपत्र है, जो किसी भी यूनिवर्सिटी द्वारा प्रदत्त स्नातक की डिग्री से भी ऊंची है। उसी तरह किसी राज्य या केन्द्र में मंत्री होना मास्टर की डिग्री से ऊंची है और राज्य अथवा केन्द्र में कोई प्रतिष्ठित विभाग का मंत्री सह अपने दल अथवा पार्टी का सर्वेसर्वा होना, चाहे वह दल अथवा पार्टी छोटी ही क्यों न हो, वह डिग्री किसी भी विषय में डॉक्टरेट से बढ़कर है। मान लीजिए बरखुर्दार, आपके पिता एवं भाई अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट की उपाधि ले चुके हैं और अगर कहीं आप राज्य अथवा केन्द्र में वित्त मंत्री अथवा उप वित्त मंत्री अथवा राज्य वित्त मंत्री ही बन गए तो आप ही बताइए उनकी डिग्री को आपने फलांग दिया अथवा नहीं ? इसीलिए बरखुर्दार मेरा कहना मानिए, आप तन-मन से राजनीति में पिल पड़िए, फिर देखिए कि साल भर के अंदर ही जनतंत्र द्वारा प्रदत्त डिग्री आपको प्राप्त हो जाती है या नही? मंत्री न भी बनें, विधायक तो अवश्य ही बन जाएंगे। मतलब एमए न सही, बीए तो पास कर ही जाएंगे। हालांकि मेरा अनुमान है कि एमए ही पास कर लेंगे।’’ संतराम ने तब यह पाठ पढ़ाया था उसे।
उस पाठ को पढ़कर वह मंत्री तो अवश्य बन गया, मतलब एमए की डिग्री हासिल कर ली, परन्तु स्थायित्व पर संतराम की नीयत और राहू दृष्टि से भारी संदेह था। वह सोचने लगा कि सुरेखा ठीक कहती थी कि संतराम बहुत बड़ा फ्रॉड किस्म का आदमी है तथा उसने सदा यूज एंड थ्रो की नीति अपनाई है। बस केवल एक ही भरोसा है कि उसके साथ और चार विधायक हैं।
खैर ग्रामीण विकास विभाग का कार्यभार संभालते ही शैल ने उस विभाग की कार्य संस्कृति एकदम बदल दी थी। यों तो ग्रामीण विकास विभाग को मोटी कमाई का विभाग कहा जाता है, लेकिन वहां कार्य भार संभालते ही उसने लूट-खसोट की नीति को सख्ती से रोक दिया। इसके पहले आधी से अधिक विकास योजनाएं कागज पर ही पूरी हो जाती थीं और उसकी राशि, जो जनता की गाढ़ी कमाई होती है, की निकासी भी हो जाती थी, उन्हें उसने एकदम रोक दिया।
‘‘शैलजी, अधिक साधुपन चुनाव के वक्त आपको और आपके साथ पार्टी को भी ले डूबेगा। चुनाव के वक्त धन की बड़ी आवश्यकता होती है। इसीलिए कार्य संस्कृति को नहीं छेड़ते तो वही अच्छा होता।’’ मधुमिता ने तब एक दिन शैल से कहा था।
स्पष्ट था कि संतराम ने मधुमिता से यह उसे कहलवाया था। क्योंकि अनेक अफसर संतराम के हितैषी अथवा बराबर भुगतान करने वाले थे। अतः उन्होंने ही संतराम को यह कहने के लिए बाध्य किया था।
‘‘मधुमिता जी, अच्छा होता, आप दूसरे मंत्री के विभाग में टांग नहीं अड़ाती। मैं अपनी समझ से ठीक कर रहा हूं।’’ एक छोटा-सा जवाब शैल ने दिया था, परन्तु वह जवाब तो मधुमिता एवं संतराम के दिल में तीर के समान लगा था तथा वे शैल को सबक सिखाना चाहने लगे थे।
यों तो शैल भी जानता था कि पद पर रह कर धन अर्जित करना ही पड़ेगा, वर्ना मौजूदा प्रजातांत्रिक पद्धति में पद पर बने रहना मुश्किल है। लेकिन उसने कागजी कारोबार को फिर भी बंद कर दिया। इसके अलावा अपने विभाग का कार्य अधिकतर नौजवानों से कराना शुरू कर किया। साथ के चारों विधायक उसके सलाहकार थे। इस तरह युवा वर्ग में उनकी पकड़ बहुत मजबूत होने लगी थी। इसके अलावा उसने अपने उस फाइनेंसर को सदा खुश रखने की चेष्टा की। इससे शैल का प्रभाव बढ़ने लगा था।
शैल का यह बढ़ता प्रभाव संतराम की आंखों को वक्र करने लगा था। किसी न किसी तरह वह शैल के पंख कतरने की चेष्टा में लग गया था। वह अपने आदमियों से शैल पर भ्रष्टाचार में लिप्त रहने, अन्य अनैतिक काम करने, अवैध ढंग से धन इकट्ठा करने वगैरह का आरोप लगवाने लगा था। सच पूछा जाए तो विधानसभा चुनाव के वक्त से ही संतराम इस तरह की कुचेष्टा करने लगा था। उसने तब शैल के पक्षधर उम्मीदवारों को किसी न किसी बहाने टिकट ही नहीं दिया था।
‘‘बरखुर्दार, पार्टी के पुराने और समर्पित कार्यकर्ताओं का भी ध्यान तो रखना पड़ेगा न ? फिर मैं कहां कहता हूं कि आपके द्वारा प्रस्तावित उम्मीदवार खरे, कर्मठ तथा विधायक बनने योग्य नहीं हैं ? उनपर भी ध्यान रखा जाएगा। श्रीमती राजश्री शर्मा एवं नंदलाल वर्माजी को तो मेरा विचार है कि उन्हें आने वाले लोकसभा चुनाव में चांस देने की चेष्टा की जाएगी। जहां तक रजनी मेहता का सवाल है, तो किसी अन्य जिले से उम्मीदवार बनाया जा सकता है। परन्तु हमने जो उम्मीदवारों की लिस्ट बनाई है उसमें रद्दोबदल की कोई गुंजाइश नहीं है। रद्दोबदल आत्मघाती भी हो सकता है।’’ संतराम ने कहा था।
रजनी का जो कार्यक्षेत्र था, वहां से संतराम ने अपनी बेटी को उम्मीदवारी का टिकट दिया तथा दूसरे क्षेत्र से अपनी पत्नी को। रजनी ने यह देखकर टिकट लेने से इन्कार कर दिया था, परन्तु शैल के कहने पर मधुमिता की सफलता के लिए जी जान से जुट गई थी। रजनी की मेहनत की बदौलत मधुमिता जीत भी गई, जबकि उसकी पत्नी हार गई थी।
संतराम ने इस तरह तब ही शैल को दरकिनार करना चाहा था, परन्तु उसके साथ चार और विधायक जो एकदम चिपके थे, इसी कारण वह शैल को दरकिनार कर नहीं पाया था। उसके बाद उसने यह नई चाल चली और अपने आदमियों द्वारा शैल के खिलाफ एक से एक आरोप लगवाने शुरू कर दिए थे। फलतः आपस में रस्साकशी सी चलने लगी थी।
संतराम के इन कृत्यों से शैल की छठी इन्द्रिय जाग उठी थी। भविष्य में खतरा देख उसने एक नये दल ‘‘छात्र-युवा संघर्ष मोर्चा’’ की नींव डाली। दल का विधिवत रजिस्ट्रेशन उसने कराया। संतराम इस पर लाल-पीले भी हुए और कहा, ‘‘बरखुर्दार आपके इस काम से आपकी विधायकी तक जा सकती है। मंत्रिपरिषद् से निलम्बन तो अवश्यम्भावी है।’’
‘‘एक तो महाशय जी वह दल कोई अलग न होकर अपने ही दल की युवा शाखा है। फिर उस दल का मैं अथवा मेरे चारों विधायक साथी न कोई पदाधिकारी हैं और न सदस्य ही। उस छात्र-युवा संघर्ष मोर्चा के श्री नंदलाल वर्मा जी अध्यक्ष हैं, श्रीमती राजश्री शर्मा सचिव, सुश्री रजनी मेहता उपसचिव तथा इसी तरह अन्य पदाधिकारी हैं। अतः एंटी डिफेक्शन एक्ट हम पर लग ही नहीं सकता है। फिर भी आप स्वतंत्र हैं जो चाहें कर सकते हैं।’’ शैल ने भी तब संतराम को चैलेंज दे डाला था।
‘‘बरखुर्दार, जन-जागरण पार्टी का अध्यक्ष मैं और उसकी नई शाखा खोलें आप, वह भी मेरी अनुमति के बगैर ? आप क्या मुझे बच्चा समझ बैठे हैं ? सुन लीजिए, मेरे एक इशारे पर मुख्यमंत्री आपको मंत्रिपरिषद् से बर्खास्त कर सकते हैं।’’ संतराम ने धमकी दी थी।
शैल ने तब संतरामजी की धमकी के बारे में अपने साथियों से कहा। सभी ने मिलकर तब इस पर विचार-विमर्श किया और दूसरे दिन शैल सहित आठ विधायक मुख्यमंत्री से जा मिले थे। उन्होंने संतरामजी की धमकी के बारे में उनको कह सुनाया और कहा, ‘‘मुख्यमंत्री जी यदि ऐसी ही कोई खिचड़ी आपके और संतराम जी के बीच पक रही है तो कोई बात नहीं। लेकिन उस हालत में सुन लीजिए हम आगे एक साथ सरकार से अपना समर्थन वापस लेने के लिए मजबूर हो जाएंगे।’’
मुख्यमंत्री श्रीधर स्वामी ने जब उन आठों को एकदम एकजुट देखा जो चौकन्ने हो गए। सालभर के अंदर लोकसभा का चुनाव भी होना था। इस हालत में सरकार अस्थिर होने से लोकसभा चुनाव में इसका गहर असर पड़ता।
‘‘आपलोगों ने यह कैसे मान लिया कि किसी मंत्री के कहने से मैं अपने दूसरे सहयोगी मंत्री को बर्खास्त कर दूंगा ? वैसे शैलजी भी ऐसा कुछ नहीं करें, जिससे सरकार की बदनामी हो या सरकार अस्थिर हो।’’ मुख्यमंत्री ने तब उन्हें कहा था।
इस तरह मुख्यमंत्री ने तब उन्हें शांत कर दिया, परन्तु उसके बाद उन आठों की एकता तोड़ने की चेष्टा भीतर ही भीतर काफी जोर शोर से श्रीधर स्वामी और संतराम करने लगे थे।
इस तरह जब मुख्यमंत्री श्रीधर स्वामी तथा उपमुख्यमंत्री संतराम विद्रोही शैल को कमजोर करना चाह रहे थे, तब शैल द्वारा नवगठित छात्र-युवा संघर्ष मोर्चा को अधिक से अधिक शक्तिशाली करने और चुनाव कमीशन द्वारा मान्यता प्राप्त कराने की चेष्टा परोक्ष रूप से काफी जोर शोर से की जा रही थी। छात्र-युवा संघर्ष मोर्चा द्वारा बड़ी बड़ी रैलियों का आयोजन किया जाने लगा था। जन-समस्याओं को लेकर सभाएं, धरना-प्रदर्शन इत्यादि अनेक तरह के आंदोलन किए जा रहे थे और लोगों को यह बताया जाने लगा था कि जब तक युवा पीढ़ी के हाथ में सत्ता की बागडोर नहीं आएगी, तब तक इन समस्याओं का समाधान नहीं हो पाएगा। वे दहाड़ते हुए कहने लगे थे कि आने वाले लोकसभा एवं विधानसभा के चुनाव में युवा वर्ग को चुनकर इसका मुंहतोड़ जवाब देना है।
एक तरफ इस तरह संगठन और मोर्चा के प्रचार-प्रसार पर ध्यान दिया जा रहा था तो दूसरी ओर चुनाव आयोग से मान्यता प्राप्त करने की चेष्टा जी जान से की जा रही थी।
अंततोगत्वा साल बीत गया और लोकसभा के चुनाव की घोषणा भी हो गई। फिर तो सभी पार्टियों की बैठकें होने लगीं। किसी भी राष्ट्रीय या क्षेत्रीय पार्टी में अब वह दम कहां रहा कि अकेले अपने बलबूते पर चुनाव लड़े। अब तो गठबंधनों का दौर है। सभी गठबंधन करने के लिए सहयोगी दलों को तलाशने लगे थे। इस क्रम में श्रीधर स्वामी की तत्कालीन सत्ताधारी पार्टी और जन-जागरण पार्टी में फिर गठबंधन हुआ और उसके तहत दो सीटें लोकसभा की जन-जागरण पार्टी को मिली। शैल ने तब संतराम को याद दिलाया कि गत विधानसभा चुनाव में पार्टी ने निर्णय लिया था कि लोकसभा के चुनाव में श्रीमती राजश्री शर्मा और श्री नंदलाल वर्मा को टिकट दिया जाएगा। अतः उन्हें टिकट दिया जाना चाहिए।
‘‘बिल्कुल नहीं। बरखुर्दार उन्होंने नया राजनैतिक मोर्चा छात्र-युवा संघर्ष मोर्चा बना लिया है और उसकी मान्यता के लिए सचेष्ट हैं, इसलिए उन्हें टिकट नहीं दिया जाएगा।’’ संतराम ने कहा था।
संतराम ने अंत में एक सीट पर अपने पुत्र राजेश को और दूसरी सीट पर अपनी पत्नी सावित्री देवी को टिकट दिया और पुरजोर ढंग से चुनाव के मैदान में कूद पड़ा था। इधर बमोकाबले उनके छात्र युवा-संघर्ष मोर्चा की ओर से एक सीट पर श्रीमती राजश्री शर्मा और दूसरी पर श्री नंदलाल वर्मा को खड़ा किया गया।
चूंकि तब तक चुनाव आयोग से छात्र-युवा संघर्ष मोर्चा को मान्यता प्राप्त नहीं हुई थी, इसीलिए श्रीमती राजश्री शर्मा और श्री नंदलाल वर्मा निर्दलीय उम्मीदवार ही माने गए थे, जबकि महेंद्र किशोर, श्रीधर स्वामी एवं संतराम की पार्टियां मान्यता प्राप्त थीं। अतः मान्यता प्राप्त करने के लिए छात्र-युवा संघर्ष मोर्चा को दो में से कम से कम एक सीट अवश्य जीतना था, जबकि अन्य तीन ऐसी सीटों से वोट प्रतिशत प्राप्त करने के लिए मोर्चा वहां से भी चुनाव लड़ रही थी, जिन सीटों पर कम से कम उनके उम्मीदवारों की जमानतें जब्त न हों।
जब मुकाबला पुरजोर चलने लगा, तब न सिर्फ श्रीधर स्वामी और संतराम विद्रोही को, बल्कि महेंद्र किशोर को भी लगने लगा कि शैल के नाम की आंधी सी बनती जा रही है। यद्यपि शैल और उसके विधायक साथी खुलकर प्रचार-प्रसार में हिस्सा नहीं ले पा रहे थे, फिर भी छात्र-युवा संघर्ष मोर्चा की तूती बोलने लगी थी।
अंत में वोट पड़े। मतगणना भी हुई और अपेक्षा के अनुरूप छात्र-युवा संघर्ष मोर्चा के दोनों उम्मीदवार श्रीमती राजश्री शर्मा और श्री नंदलाल वर्मा चुनाव जीत गए। बाकी तीन उम्मीदवार भी अपनी-अपनी जमानत बचाने में सफल रहे।
श्रीमती राजश्री शर्मा ने संतराम की पत्नी सावित्री देवी को एक लाख से भी अधिक वोटों से हराया था। श्री नंदलाल वर्मा ने भी महेंद्र किशोर की पार्टी के उम्मीदवार को लगभग 38 हजार वोटों से हराया था। संतराम के पुत्र राजेश की तो जमानत भी जब्त हो गई थी।
शैल की इस सफलता से संतराम के साथ श्रीधर स्वामी भी खार खाए बैठे थे और किसी तरह उसे बदनाम कर मंत्रिपरिषद् से बर्खास्त करने का षड्यंत्र रचने लगे। इसके लिए उन दोनों ने शैल के साथी विधायकों में से एक को मंत्री पद और अन्य को तरह-तरह का प्रलोभन देना शुरू किया। परन्तु शैल के वे साथी विधायक उसके प्रति समर्पित थे। उन्होंने तब आपस में मिलकर फैसला लिया कि सरकार को अपदस्थ कर देना चाहिए, वर्ना श्रीधर स्वामी एवं संतराम उन्हें कहीं न कहीं फंसा सकते हैं।
अंत में वही हुआ। दूसरे ही दिन सुबह शैल ने मंत्री पद से अपना इस्तीफा मुख्यमंत्री श्रीधर स्वामी के पास भिजवा दिया। श्रीधर स्वामी ने तब झट से संतराम को बुलवाया। दोनों ने इसपर विचार किया। वे तो यह चाहते ही थे। इसलिए शैल के इस्तीफे को झट से स्वीकार कर महामहिम राज्यपाल महोदय के पास स्वीकृति की मुहर लगाने के लिए भेज दिया।
श्रीधर स्वामी इसके बाद हेलीकॉप्टर से राज्य के एक सुदूर क्षेत्र में, जहां से कभी उनकी पार्टी का कोई उम्मीदवार नहीं जीता था, चले गए। वहां उनका नागरिक अभिनंदन होना था। इस बार वह वहां पर अपनी जड़ जमाने में सफल हुए थे।
वहां पर उनके नागरिक अभिनंदन की कार्रवाई शुरू होने ही वाली थी कि श्रीधर स्वामी को मोबइल से खबर मिली कि जन-जागरण पार्टी के 11 विधायकों में से शैल सहित छः विधायकों ने एवं दो विशुद्ध निर्दलीय विधायकों सहित कुल आठ विधायकों ने महामहिम के समक्ष सदेह उपस्थित होकर शपथपूर्वक अपना समर्थन सरकार से वापस ले लिया है। उसके बाद वे प्रेस कांफ्रेंस में इसकी घोषणा भी कर रहे हैं।
उधर विधानसभा में विरोधी दल के नेता महेंद्र किशोर ने सरकार को बर्खास्त कर विधानसभा भंग करने की मांग रख दी। इस तरह उन्होंने श्रीधर स्वामी की सरकार की अस्थिरता का फायदा चुनाव में उठाने की चाल चल दी थी।
इन समाचारों के मिलते ही श्रीधर स्वामी ने नागरिक अभिनंदन का कार्यक्रम तुरंत स्थगित करा दिया और हेलीकॉप्टर से राजधानी की ओर उड़ चले थे। राजधानी पहुंचते ही उन्हें राजभवन का बुलावा आया, जहां महामहिम ने उन्हें अपना पक्ष रखने के लिए कहा।
‘‘महामहिम महोदय, यह हमारी सुस्थिर सरकार को अस्थिर करने की विरोधियों द्वारा रची गई चाल है। हमने अपने एक मंत्री को बर्खास्त भर किया है और उनसे इस्तीफा लिया है। इससे क्षुब्ध होकर वह मंत्री विरोधी दल वालों से जा मिला और उसी के बहकावे में आकर बाकी सात विधायकों ने समर्थन वापसी का दरखास्त दिया है। अब मैं आ गया हूं। उन्हें समझा लूंगा। बस उस मंत्री द्वारा समर्थन वापसी से हमारी सरकार अल्पमत में नहीं आ गई है। हमें मौका दिया जाए, हम अपना बहुमत सदन में सिद्ध कर देंगे।’’ श्रीधर स्वामी ने तब राज्यपाल महोदय से कहा था।
उनके इस कथन पर राज्यपाल महोदय ने उन्हें सात दिनों के अंदर सदन को आहूत कर बहुमत सिद्ध करने का आदेश दिया।
इसके बाद तो विधायकों के ‘‘हॉर्स ट्रेडिंग’’ की दर आसमान पर चढ़ गई थी। राजनैतिक सट्टेबाज एकदम सक्रिय हो उठे थे। एक-एक विधायकों के समर्थन की दर तब करोड़ों रुपए हो गई थी। फिर भी शैल के पक्षधर वे सातों विधायक शैल का साथ छोड़ने के लिए कतई तैयार नहीं थे। अंत में विधायकों का अपहरण भी करने की तैयारी होने लगी थी। परन्तु ज्योंही उसकी भनक शैल के कानों में पड़ी कि वे सातों विधायक एकदम भूमिगत हो गए थे।
इसके बाद श्रीधर स्वामी और संतराम ने गला फाड़-फाड़ कर मीडिया से कहना शुरू किया कि विपक्षवालों एवं शैलजी ने मिलकर विधायकों का अपहरण कर लिया है। उन्हें मुख्यमंत्री से मिलकर अपना दुख-दर्द कहने नहीं दिया जा रहा है, क्योंकि मुख्यमंत्री ने घोषणा कर रखी है कि अपने समर्थक हर विधायक का दुख-दर्द वह दूर करने के लिए कृतसंकल्प हैं। यदि वे विधायक मुख्यमंत्री से मिलते, तो तुरंत अपना विचार बदल देते इसलिए उन्हें मुख्यमंत्री से मिलने नहीं दिया जा रहा है।
उसके बाद कुछ ही देर के अंतराल पर एक प्रेस कांफ्रेंस और बुलाई गई। उसमें उन सातों विधायकों ने उपस्थित होकर कहा कि मुख्यमंत्री उनका अपहरण कराना चाह रहे थे, इसीलिए वे भूमिगत हैं तथा उन्होंने पुनः सरकार से समर्थन वापसी की घोषणा की।
उस प्रेस कांफ्रेंस के बाद श्रीधर स्वामी सरकार के मंत्रिपरिषद् की आपात बैठक हुई, जिसमें सर्वसम्मति से मंत्रिमंडल का इस्तीफा देने की बात तय हो गई। फिर तो दूसरे दिन साढ़े दस बजे ही राजभवन जाकर श्रीधर स्वामी ने अपने मंत्रिमंडल का इस्तीफा महामहिम राज्यपाल महोदय को सौंप दिया, जिसे महामहिम ने मंजूर कर लिया एवं केन्द्र सरकार से सलाह करने के बाद विधानसभा भंग करने की सिफारिश भी कर दी।
अंत में अन्य प्रक्रियाएं पूरी कर विधानसभा भंग कर दी गई थी। राज्य में राष्ट्रपति शासन लग गया था। विधानसभा के चुनाव हुए लगभग सवा चार साल हो भी गए थे। अतः सभी अब फिर से चुनाव की घोषणा की प्रतीक्षा और अपनी-अपनी शक्ति बढ़ाने में लग गए थे।
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