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लघुकथाः बूढ़ा बचपन



पुष्पा रघु 

 

गुनगुन काफी दिनों के बाद दुकान पर आया था. सदैव की भांति उसकी छोटी बहन चुनमुन भी साथ थी. उसने एक दस का नोट और पर्ची मुझे पकड़ा दी. पर्ची पर लिखा था ‘दो सिगरेट – एक ब्लेड’. चार रुपए वापिस. यही बात गुनगुन ने दोहराई – “अंटल! दो चिगरेट, एक ब्लेट चाल लुपए वापिस दे दो.” पाँचेक साल का है गुनगुन, दूध के दाँत भी नहीं टूटे हैं और ना ही छूट पाई है तुतलाहट. चुनमुन उससे डेढ़-दो साल छोटी है. बिलकुल गुड़िया सी.

“तुम्हारे लिए क्या दूँ टॉफ़ी या कुटकुट?” मेरे पूछने पर जल्दी से बोला - “तुछ नहीं, बछ पैछे दे दो.”

मैंने चार रुपए पर्ची का सामान देकर, एक-एक टॉफ़ी दोनों को दे दी. परन्तु गुनगुन ने वह टॉफ़ी तुरन्त काउन्टर पर रख दी. बहन चल पड़ी थी, उसे पुकारा - “तुनमुन ताफी लख दे नहीं टो पापा मालेंगे.” चुनमुन ने टॉफ़ी उसके ऊपर फेंक दी. भय लालच पर हावी था. मेरे नेत्रों के समक्ष वर कल साकार हो गया जब ये दोनों पच्चे मां के साथ दुकान पर आते थे. चॉकलेट, टॉफ़ी, कुरकुरे – खूब जिद करते थे – मां कहती थी – ‘आगे से तुम्हें दुकान पर नहीं लाऊँगी.’ मुझसे कहती - “देखो भाई साहब! सिलाई करके पेट पालती हूँ. बाप एक पैसा नहीं देता. उल्टा मुझसे झपटने आ जाता है और ये लाट साहब! फरमाइशें ही खत्म नहीं होतीं.”

परन्तु अपने राशन में कटौती कर इन बच्चों को संतुष्ट करती थी. दो सप्ताह पहले एक दिन सुना – सिलाई वाली ने आत्महत्या कर ली. उस दुर्घटना के तीसरे दिन दोनों बच्चे पिता का सामान लेने आए थे. उस दिन पर्ची में टॉफ़ी, चॉकलेट, चिप्स भी लिखे थे. मैंने बच्चों से पूछा था, “तुम्हारी मम्मी नहीं आई?” गुनगुन ने सपाट स्वर में कहा था - “मम्मी मल गई.” मैं जिस बात को कहने की हिम्मत न जुटा सका उसे यह नादान कैसी आसानी से कह गया. “कैसे मर गई?” पूछने पर कुछ अटकता हुआ-सा बोला - “पापा ने सिल में दंडा माला, मम्मी ने अंदल जाकल मच्छल वाली डबाई पी ली.”

“रोका नहीं पापा ने?”

“नई बाहल छे कुंदी लदा दी. मम्मी थूब तिल्लाई. बाद में थोला. बोले मल गई तेली मम्मी.”

“तुमने क्यों नहीं खोला?” पूछने पर इधर-उधर देख धीरे से बोला था - “पापा मुदे भी माल देते. तुनमुन अटेली लह जाती फिल.”

यद्यपि ये मासूम मां के न रहने का अर्थ पूरी तरह नहीं समझ पाए हैं, परन्तु इन कुछ दिनों में ये बड़े हो गए हैं –बिलकुल बूढ़े!

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कई प्रतिष्ठित साहित्यिक पुरस्कारों से सम्मानित रचनाकार पुष्पा रघु के बहुत से कहानी संग्रह / बाल-कथा संग्रह तथा बालगीत संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं.





पुष्पा रघु

गुनगुन काफी दिनों के बाद दुकान पर आया था. सदैव की भांति उसकी छोटी बहन चुनमुन भी साथ थी. उसने एक दस का नोट और पर्ची मुझे पकड़ा दी. पर्ची पर लिखा था ‘दो सिगरेट – एक ब्लेड’. चार रुपए वापिस. यही बात गुनगुन ने दोहराई – “अंटल! दो चिगरेट, एक ब्लेट चाल लुपए वापिस दे दो.” पाँचेक साल का है गुनगुन, दूध के दाँत भी नहीं टूटे हैं और ना ही छूट पाई है तुतलाहट. चुनमुन उससे डेढ़-दो साल छोटी है. बिलकुल गुड़िया सी.

“तुम्हारे लिए क्या दूँ टॉफ़ी या कुटकुट?” मेरे पूछने पर जल्दी से बोला - “तुछ नहीं, बछ पैछे दे दो.”

मैंने चार रुपए पर्ची का सामान देकर, एक-एक टॉफ़ी दोनों को दे दी. परन्तु गुनगुन ने वह टॉफ़ी तुरन्त काउन्टर पर रख दी. बहन चल पड़ी थी, उसे पुकारा - “तुनमुन ताफी लख दे नहीं टो पापा मालेंगे.” चुनमुन ने टॉफ़ी उसके ऊपर फेंक दी. भय लालच पर हावी था. मेरे नेत्रों के समक्ष वर कल साकार हो गया जब ये दोनों पच्चे मां के साथ दुकान पर आते थे. चॉकलेट, टॉफ़ी, कुरकुरे – खूब जिद करते थे – मां कहती थी – ‘आगे से तुम्हें दुकान पर नहीं लाऊँगी.’ मुझसे कहती - “देखो भाई साहब! सिलाई करके पेट पालती हूँ. बाप एक पैसा नहीं देता. उल्टा मुझसे झपटने आ जाता है और ये लाट साहब! फरमाइशें ही खत्म नहीं होतीं.”

परन्तु अपने राशन में कटौती कर इन बच्चों को संतुष्ट करती थी. दो सप्ताह पहले एक दिन सुना – सिलाई वाली ने आत्महत्या कर ली. उस दुर्घटना के तीसरे दिन दोनों बच्चे पिता का सामान लेने आए थे. उस दिन पर्ची में टॉफ़ी, चॉकलेट, चिप्स भी लिखे थे. मैंने बच्चों से पूछा था, “तुम्हारी मम्मी नहीं आई?” गुनगुन ने सपाट स्वर में कहा था - “मम्मी मल गई.” मैं जिस बात को कहने की हिम्मत न जुटा सका उसे यह नादान कैसी आसानी से कह गया. “कैसे मर गई?” पूछने पर कुछ अटकता हुआ-सा बोला - “पापा ने सिल में दंडा माला, मम्मी ने अंदल जाकल मच्छल वाली डबाई पी ली.”

“रोका नहीं पापा ने?”

“नई बाहल छे कुंदी लदा दी. मम्मी थूब तिल्लाई. बाद में थोला. बोले मल गई तेली मम्मी.”

“तुमने क्यों नहीं खोला?” पूछने पर इधर-उधर देख धीरे से बोला था - “पापा मुदे भी माल देते. तुनमुन अटेली लह जाती फिल.”

यद्यपि ये मासूम मां के न रहने का अर्थ पूरी तरह नहीं समझ पाए हैं, परन्तु इन कुछ दिनों में ये बड़े हो गए हैं –बिलकुल बूढ़े!

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कई प्रतिष्ठित साहित्यिक पुरस्कारों से सम्मानित रचनाकार पुष्पा रघु के बहुत से कहानी संग्रह / बाल-कथा संग्रह तथा बालगीत संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं.

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