उस पल को प्रणाम
सुनील मंथन शर्मा
िस्थ्र आखें, लेिकन पैनी नजर । कम आवाज, पर स्पष्ट शब्दों का उच्चारण । छोटे वाक्य, लेिकन बड़ी बात । हर पल हर हंसने-हंसाने के खेल के साथ गंभीर िनर्देश, आदेश या िनर्णय । जी, इन गुणों से लबरेज शख्स का नाम है श्री दीपक अम्बष्ट, जो प्रभात खबर, धनबाद के स्थानीय संपादक हैं । मैं भी इसी अखबार के सम्पादकीय िवभाग मैं कार्यरत हूँ । अब आप यह मत समझने लिगए िक अपने विरष्ठ अिधकारी की चापलूसी में ये शब्द गढे जा रहें हैं । सच तो यह है िक आज िक एक घटना ने इन शब्दों को िलखने, उनके बारे में सोचने-मनन करने के िलए परेिरत िकया है । हुआ यह िक मैं अपने िनवास स्थल सहयोगी नगर आने के िलए स्टील गेट-धनबाद के पास टेंपो के इंतजार में खडा था । कुछ पल बीते होंगे िक संपादक जी कार से कोर्ट मोड़ िक ओर जाते हुए िदखे । मेरी नजर उनपर पड़ने से पहले ही शायद उनकी नजर मुझ पर पड़ चुकी थी । उन्होंने ड्राइवर को कार रोकने को कहा, तब तक मेरी नजर उनतक पहुँच गई । मैंने जैसे ही उन्हें नमस्कार िकया, उन्होंने मुस्कुराते हुए इशारा से पूछ िलया चलना है क्या । चुकीं मेरी िदशा िवपिरत थी, इसिलए इशारे में ही इंकार करते हुए अपनी िदशा बता दी । अब आप मुझ पर हंस पड़े होंगे, सोच रहें होंगे िक इतनी छोटी सी बात के िलए इतनी लम्बी-चौडी बातें एवं िंचतन-मनन िक क्या जरूरत । जरूरत है भाई, िबल्कुल जरूरत है । इसी तरह के पल एवं इसी तरह िक घटनाये पिरवर्तन को परेिरत करतीं हैं । आत्मा भी इस बदलाव को आत्मसात करती है और यहीं पैदा होती है श्रद्धा , जो मिंजल तक पहुँचाने में सहायक होती है । ऐसे पल और ऐसी घटनाएँ महान वयक्ितत्व के कर-कमलों से ही पैदा होती हैं और ऐसा महान व्यक्ितत्व यिद िकसी संस्थान का अिधकारी हो तो संस्थान का िबल्कुल उतरोत्तर िवकास संभव है । अब देिखये, िकसी संस्थान के विरष्ठ अिधकारी अपने ही कर्मचारी से बाहर िमलना, उनसे बात करना अपनी शान के िखलाफ समझते हैं, लेिकन हमारे संपादक जी की ओर से ड्राइवर को कार रोकने को कहते हुए अपने साथ जाने के बारे में केवल इशारा में ही पूछ लेना, यह दर्शाता है िक उन्हें अपने अधीनस्थ कर्मचारी िक िचनता है, कार्यालय में भी और बाहर भी और यह भी दर्शाता है िक वे िकतने कोमल व संवेदनशील हैं । और यही पूछ लेने िक घटना ही उनके परित श्रद्धा जगाती है और कुछ कर गुजरने िक परेरणा भरती है । मेरी ओर से भी कुछ कर िलया जाए तो इसका श्रेय उस एक पल व उस घटना को ही जायेगा और उस महान वयक्ितत्व को बारम्बार प्रणाम होगा ।
सुनील मंथन शर्मा
िस्थ्र आखें, लेिकन पैनी नजर । कम आवाज, पर स्पष्ट शब्दों का उच्चारण । छोटे वाक्य, लेिकन बड़ी बात । हर पल हर हंसने-हंसाने के खेल के साथ गंभीर िनर्देश, आदेश या िनर्णय । जी, इन गुणों से लबरेज शख्स का नाम है श्री दीपक अम्बष्ट, जो प्रभात खबर, धनबाद के स्थानीय संपादक हैं । मैं भी इसी अखबार के सम्पादकीय िवभाग मैं कार्यरत हूँ । अब आप यह मत समझने लिगए िक अपने विरष्ठ अिधकारी की चापलूसी में ये शब्द गढे जा रहें हैं । सच तो यह है िक आज िक एक घटना ने इन शब्दों को िलखने, उनके बारे में सोचने-मनन करने के िलए परेिरत िकया है । हुआ यह िक मैं अपने िनवास स्थल सहयोगी नगर आने के िलए स्टील गेट-धनबाद के पास टेंपो के इंतजार में खडा था । कुछ पल बीते होंगे िक संपादक जी कार से कोर्ट मोड़ िक ओर जाते हुए िदखे । मेरी नजर उनपर पड़ने से पहले ही शायद उनकी नजर मुझ पर पड़ चुकी थी । उन्होंने ड्राइवर को कार रोकने को कहा, तब तक मेरी नजर उनतक पहुँच गई । मैंने जैसे ही उन्हें नमस्कार िकया, उन्होंने मुस्कुराते हुए इशारा से पूछ िलया चलना है क्या । चुकीं मेरी िदशा िवपिरत थी, इसिलए इशारे में ही इंकार करते हुए अपनी िदशा बता दी । अब आप मुझ पर हंस पड़े होंगे, सोच रहें होंगे िक इतनी छोटी सी बात के िलए इतनी लम्बी-चौडी बातें एवं िंचतन-मनन िक क्या जरूरत । जरूरत है भाई, िबल्कुल जरूरत है । इसी तरह के पल एवं इसी तरह िक घटनाये पिरवर्तन को परेिरत करतीं हैं । आत्मा भी इस बदलाव को आत्मसात करती है और यहीं पैदा होती है श्रद्धा , जो मिंजल तक पहुँचाने में सहायक होती है । ऐसे पल और ऐसी घटनाएँ महान वयक्ितत्व के कर-कमलों से ही पैदा होती हैं और ऐसा महान व्यक्ितत्व यिद िकसी संस्थान का अिधकारी हो तो संस्थान का िबल्कुल उतरोत्तर िवकास संभव है । अब देिखये, िकसी संस्थान के विरष्ठ अिधकारी अपने ही कर्मचारी से बाहर िमलना, उनसे बात करना अपनी शान के िखलाफ समझते हैं, लेिकन हमारे संपादक जी की ओर से ड्राइवर को कार रोकने को कहते हुए अपने साथ जाने के बारे में केवल इशारा में ही पूछ लेना, यह दर्शाता है िक उन्हें अपने अधीनस्थ कर्मचारी िक िचनता है, कार्यालय में भी और बाहर भी और यह भी दर्शाता है िक वे िकतने कोमल व संवेदनशील हैं । और यही पूछ लेने िक घटना ही उनके परित श्रद्धा जगाती है और कुछ कर गुजरने िक परेरणा भरती है । मेरी ओर से भी कुछ कर िलया जाए तो इसका श्रेय उस एक पल व उस घटना को ही जायेगा और उस महान वयक्ितत्व को बारम्बार प्रणाम होगा ।
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