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ईश्वर एक लाठी है

स्वप्निल श्रीवास्तव
ईश्वर एक लाठी हैजिसके सहारे अब तकचल रहे हैं पितामैं जानता हूँ कहाँ-कहाँदरक गई है उनकीयह कमज़ोर लाठीरात में जब सोते हैं पितालाठी के अन्दर चलते हैं घुनवे उनकी नींद में पहुँच जाते हैंलाठी पिता का तीसरा पैर हैउन्होंने नहीं बदली यह लाठीउसे तेल-फुलेल लगाकरकिया है मज़बूतकोई विपत्ति आती हैवे दन से तान देते हैं लाठीवे हमेशा यात्रा मेंले जाते रहे उसे साथऔर बमक कर कहते हैंक्या दुनिया में होगी किसी के पासइतनी सुन्दर मज़बूत लाठी!पिता अब तक नहीं जान पाए किईश्वर किस कोठ की लाठी है

विशाल श्रीवास्तव

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