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लगाव जरुरी है

अमिताभ प्रियदर्शी

ब्लॉग पर आए मुझे कुछ अधिक दिन नहीं हुए। इस बीच काफी अच्छा लगा यह जानकर कि ब्लॉग लोगों से जुड़ने का अच्छा जरिया है। अच्छा लगता है जब अपनी रचना पर, अपनी बात पर हमें प्रतिक्रिया मिलती है। लेकिन, एक बात मुझे जो खटकती है वह यह है कि मुझे लगता है कि हम काफी स्वार्थी हो गए हैं। किसी ने आपकी रचना पर प्रतिक्रिया दी तो पलट कर हम भी उनके ब्लॉग पर जा कर औपचारिकता पूरी कर देते हैं। यह ठीक नहीं लगता है। होना तो यह चाहिए कि हम खुद ही अपने पसंद के ब्लॉग पर जाकर अपनी तलाश पूरी करें। रचना को पढ़कर जो महसूस हो उसे ही अपनी प्रतिक्रिया के रूप में उकेर दें। न कि किसी ने प्रतिक्रिया दी तो उनके ब्लॉग में प्रतिकिया ठोंक दी - अच्छी रचना। चाहे वह रचना अच्छी लगे या न लगे। मुझे तो कम से कम यह नहीं जंचता। एक और बात, यह मेरी अपनी बात है। हो सकता है अन्य लोगो को यह बात पसंद न आए। जो मेरी सोच से सहमत नही हैं उनसे पहले ही मैं क्षमा मांग लेता हूँ। लेकिन, मेरा मानना है कि जुडाव दिल से होना चाहिए, जुबान से नहीं। मुझे लगता है ब्लॉग आज के समय में एक सरल और सहज माध्यम है अभिव्यक्ति का। अपनी बातों को उकेरने का। अपनी संस्कृति और साहित्य को बचाने का भी। ऐसे में इसका सहज और गंभीर उपयोग होना चाहिए न कि सतही और औपचारिक। कुल मिलाकर लगाव जरूरी है।

2 comments

Alpana Verma said...

बात सही है.
लेकिन दोनों बातों पर अमल करते हुए ब्लॉग्गिंग हो पाती है.अपनी पसंद के लेख भी पढ़ते जायें और जिस ने आप को पढ़ा है उस को भी पढ़ें..लेकिन सही राय दे.
बहुत से लोग हैं जो एक ही कमेन्ट कई ब्लोग्स पर कॉपी-पेस्ट करते चले जाते हैं..कभी ब्लोग्वानी का कमेंट्स वाला साइड देखें तो पता चल जाएगा.

कौन आप की पोस्ट पढ़ रहा है उस के कमेन्ट देख कर पता चल जाता है.लेकिन अगर आप के ब्लॉग पर कोई टिपण्णी देता है तो उस के ब्लॉग पर jana और उस को भी पढ़ना कोई ग़लत नहीं..
haan लेकिन सिर्फ़ सतही और ओपचारिकता निभाना ग़लत है.लेकिन इस बात को लगभग सभी ब्लॉगर जानते हैं.

Udan Tashtari said...

बारंबार इस विषय पर विमर्श हुआ है और होता वो ही है कि जो जिसका मन आये, वो वैसा करे. आपने अपने विचार रखे, अच्छा लगा.

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