नारी का रविवार
नारी का रविवार
अपने लिए कभी कहाँ ,देखो वो जी पाती है,
देवता बसते उस घर में, जहाँ नारी पूजी जाती है।
सुबह से शाम तक भागम भागी, छूटे न कोई काम,
उसके नसीब में न इतवार की छुट्टी, न कोई आराम।।
खा पीकर सब सोने गए, वे देर रात तक जाग रही,
सुबह होते ही काम निपटाने, सरपट देखो भाग रही।
भाग भागकर घर के सारे, काम वो निपटाती है,
जबतक सबकी नींद खुले, वे रसोई में चली जाती है।।
बड़े चाव से सबके लिए ,नास्ता वो बनाती है,
सबको पहले खिला लेती, खुद आखिर में खाती है।
नाश्ता खाना की भाग दौड़ में, होती सुबह से शाम,
तेरी किस्मत में कहाँ लिखी है, रविवार को भी आराम।।
इस नारी शक्ति का कोई, क्या कर सकता भुगतान,
नारी के हर इस रूप को, अरविन्द करे प्रणाम।
अपने लिए कभी कहाँ ,देखो वो जी पाती है,
देवता बसते उस घर में, जहाँ नारी पूजी जाती है।
सुबह से शाम तक भागम भागी, छूटे न कोई काम,
उसके नसीब में न इतवार की छुट्टी, न कोई आराम।।
खा पीकर सब सोने गए, वे देर रात तक जाग रही,
सुबह होते ही काम निपटाने, सरपट देखो भाग रही।
भाग भागकर घर के सारे, काम वो निपटाती है,
जबतक सबकी नींद खुले, वे रसोई में चली जाती है।।
बड़े चाव से सबके लिए ,नास्ता वो बनाती है,
सबको पहले खिला लेती, खुद आखिर में खाती है।
नाश्ता खाना की भाग दौड़ में, होती सुबह से शाम,
तेरी किस्मत में कहाँ लिखी है, रविवार को भी आराम।।
इस नारी शक्ति का कोई, क्या कर सकता भुगतान,
नारी के हर इस रूप को, अरविन्द करे प्रणाम।

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