विक्षिप्त
उदय शंकर उपाध्याय
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शहर में नया आया था। अभी मुहल्लों से परिचय का दौर चल रहा था। मैं ग्रामीण पृष्ठभूमि का था, इसलिए पास-पड़ोस की घटनाओं पर नजर रखना मेरी आदत थी। तभी बच्चों का शोर सुना। बच्चे एक पागल पर कंकड़ फेंककर आनंद ले रहे थे। कंकड़ की चोट से वह पागल चीखता-मास्साले को! मास्साले को!!
अब वह मुझे कई मुहल्लों में और सड़कों पर दिख जाता था। एक मैला-कुचैला अंडरवियर पहने। कमर के ऊपर कोई कपड़ा नही। घुंघराले बाल, लेकिन जटाओं में तब्दील। बढ़ी हुई दाढ़ी और नजर में गुस्सा। राह चलते अपने दोनों हाथ बांध लेता और दोहत्थड़ बनाकर आकाश में किसी को पीटता--मास्साले को! कुल मिलाकर एक आक्रामक छवि का था, लेकिन किसी पर कोई प्रहार कभी नही किया। कभी रोनी सूरत भी बनाता, लेकिन मुट्ठियाँ तानकर मास्साले को जरूर कहता।
शहर में कई विक्षिप्तों से सामना हो जाता है और लोग प्रायः उनकी गतिविधियों पर ध्यान नही देते। अपने काम से फुरसत हो तो किसी और के बारे में सोचा जाय। मैं भी उसी बहुसंख्यक समुदाय में शामिल हो गया था।
एकबार सरकार के सामूहिक सहभागिता के कार्यक्रम में भाग लेने में जोगीडीह बस्ती पहुँचा। ग्रामीणों के साथ दरी पर बैठकर आपसी चर्चा में मशगूल था। मैं लोगों को सरकार की योजनाओं और संरचनाओं पर लोगों को स्वामित्व-भाव रखने की घुट्टी पिला रहा था। तभी मेरी नजर उस विक्षिप्त पर पड़ी, जो एक खंडहर हो चुके मकान पर अपनी लातें बरसा रहा था--मास्साले को! मास्साले को!!
ग्रामीणों ने बताया कि वह इसी जोगीडीह गांव का वासी है। उसके माता-पिता की मृत्यु हो चुकी है और वह अपनी बड़ी बहन के साथ रहता था। जब वह 12 बरस का था, और उसकी बहन 15 की, तो उसने अपनी नजरों के सामने बहन का बलात्कार होते देखा था। वह मासूम कुछ नही कर पाया और उसकी बहन ने लोक-लाज के भय से कुएँ में कूदकर आत्मघात कर लिया था। अब इस विक्षिप्त का अपना घर गिर चुका है। और वह जिस घर पर अपनी लातें चला रहा है, वह बलात्कारी का घर है। बलात्कारी के परिवार को गाँव वालों ने बाहर निकाल दिया है।
तब से किसी विक्षिप्त को देखता हूँ तो उसके पागलपन के पीछे समाज के ठेकेदारों का शोषण दीखता है या परिवार वालों की उपेक्षा। पता नही, मैं कहाँ तक सही हूँ।

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