ऐसी कोई रात्रि आज तक पैदा नहीं हुई जिसकी भोर नहीं हो सकती
उदय शंकर उपाध्याय
मैं जानता हूँ ज़िंदगी अक्सर अकेली होती
जब आँसुओं में कोई कली नहाती है ।
जब दर्द का एहसास तूफान का रूप धारण करता है ।
जब नूर की किरण आख़िरी साँस लेने वाली होती है ।
मगर मौत जीवन का हमेशा अंत ही हो ये ज़रूरी नहीं ।
कभी-कभी ये नए जीवन का आग़ाज़ भी हो सकती है
बिना पंख के ही ऊँची परवाज़ भी हो सकती है ।
मरूस्थल की कली की तरह ज़िंदगी अकेली होके भी अक्षय हो जाती है ।
मौत की गोद में भी ज़िंदगी की जीत तय हो जाती है ।
फूल की तरह ज़िंदगी कौशलपूर्ण कोमल हो तो सकती है,
लेकिन कमज़ोर नहीं हो सकती ।
ऐसी कोई रात्रि आज तक पैदा नहीं हुई जिसकी भोर नहीं हो सकती ।

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