Header Ads

बढ़ती आबादी



सुकृत्य करने को हुआ था,
इस धरा पर मनुज अवतरण।
संग प्रकृति के था चलना,
संसाधनों का कर संवरण।

महज दो सौ साल में,
सात गुनी कर दी आबादी।
धरा-दोहन हो रहा अब,
खतरे में भी होगी आज़ादी।

एक-तिहाई लोगों की,
धरती बने हैं चीन-भारत।
आशियाना घट रहा,
सुविधाएँ भी होंगी नदारद।

महज कुछ परिवार में,
सिमट गई है सारी सुविधा।
दारिद्र्य में पलता है बचपन,
युवावस्था भरी दुविधा।

स्थान-संकट, अन्न-संकट,
जल का संकट आनेवाला।
प्राणवायु का भी संकट,
नैकट्य में ही होनेवाला।

पिघलती हैं हिम की नदियाँ,
लगता प्रलय अब आएगा।
प्रजातियाँ सब नष्ट होंगी,
मानव तू क्यों बच पायेगा।

सुन्दर धरा का तोहफा दें हम,
आनेवाली पीढ़ियों को।
संक्षिप्त कर परिवार अपना,
जोड़ें स्वर्ग की सीढ़ियों को।

अब समय वह आ गया,
आबादी का विस्फोट रोको।
अहर्निश संतान-प्राप्ति,
कामना को मन में रोको।
©उदयशंकर उपाध्याय,
13.07.2017, गुरुवार।

No comments

Partner : ManthanMedia.com. Theme images by Maliketh. Powered by Blogger.