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बढ़ती जनसंख्या


तैंतीस करोड़ देशवासी थे,हो गए आज सवा अरब।
मगर अभी तक बचा सके न,हम सब भारत का गौरव।

लड़ झगड़ कर हम देते जान,धर्म और जाति के नाम।
कभी नहीं सोचते मगर हम,इक हमारा है आवाम।

बढ़ती जनसंख्या भारत में,है चिंता का एक विषय।
कहाँ मिलेगा इतने जन को,रहने के खातिर आश्रय?

यही सोचकर  काट रहे  हम,दनादन पेड़ों  को रोज।
बो रहे हैं  कंक्रीट के  वन,कर  रहे हैं हल का खोज।।

मार-काट रोज लगी रहती ,भोजन वस्त्रों के खातिर।
रोजगार भी हुई नदारद,युवा वर्ग बहाते नीर।।

भ्रष्टाचार   का   बोलबाला,बढ़  रहा भारत में  नित।
विद्यार्जन  करके   बच्चे, तैयार  होते अशिक्षित।।

कारण बिल्कुल साफ झलकता, गौर जरा फरमाने से।
इतने बच्चे कहाँ बिठाए,छोटी सी विद्यालय में?

इसीलिए तो पनप रहा नित,विद्यालय हर गलियों में।
पठन-पाठ से बढ़कर बच्चें,मन देते रंग-रेलियों में।।

इस प्रकार होती है अक्सर,भविष्य बच्चों का तबाह।
चुन लेते हैं मासुम बच्चें,अनजाने ही गलत राह।।

कोई  आतंकी बनता  इनमें,कोई बनता डाकु-चोर।
भारत माँ  पर  करते  रहते, नित अत्याचार घनघोर।।

कितना दुख सहना पड़ता है,जनसंख्या के बढ़ने से।
सिर्फ एक उदाहरण काफी, इसे घुसा लो जेहन में।।

अपनाकर परिवार नियोजन,जनसंख्या को दो विराम।
दो बच्चें खेले हर घर में,देश को दो यह पैगाम।।


ममता बनर्जी "मंजरी"

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