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मैं दीवानी हूँ उन वीरों की

सुबह करीब से जब मैने उस फूल को देखा
देखा वह सिसक रही थी
उसके तन से ओस नहीं
उसके आँसू टपक रहे थे,

बोली वो मुझसे सर पर मत रख मुझे मूरत की
डाल मुझे उन वीर पथों पर जो जाते हो सीमा की ओर,

हाँ मैं दीवानी हूँ उन वीरों की
जो वतन की रक्षा को निकले हैं सीना तान के,

रोती हूँ तब मैं जब भाई,भाई को मारता है
है जो तुझमें गर्म लहू तो सीमा पर क्यों नहीं जाता है,
महेश"अमन"
रंगकर्मी

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