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अतुकांत कविता


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आज तक मुझे
कभी नहीं हुए
किसी दिव्यता के दर्शन
खासकर उस जगह
जहां मंदिर हो या कि मस्जिद
इन दोनों जगह
बढी हुई भीड़ और कोलाहल से
बराबर अच्छा लगा है
....मुझे घर का एकांत
जहाँ बैठकर कर ली जाय
इश्वर या ख़ुदा की अराधना ।
इसी एकांत में
दिव्य शांति - यात्रा सी
सच्ची अनुभूति का भान हुआ
लगा कि ..., यहीं कहीं है
सच्ची शांति की वह शक्ति
जो समस्त क्रिया कलापों पर
नजर रखती है  ! !

संजय ' करूणेश '

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