कबूतर
गन्दा कर देते हैं पूरा घर-आँगन
रोज़-रोज़ धोओ पखारो
उनकी गन्दगी साफ़ करो
रोशनदान, मुंडेर सभी गन्दे हो गये हैं
-भगाओ इन्हें !
कई बार घर आए लोगों ने कहा है
हमने भी सोचा है कई बार !
अब क्या करें !
इनके साथ जीने की आदत जो पड़ गयी है हमारी
तीन पीढ़ियों का साथ निभाया है कबूतरों ने
ऐसे कैसे छोड़ दें ?
आँगन है - इन्हीं से तो पता चलता है
बहुत प्यार से देखो
तो कैसे चले आते हैं तुम्हारे पास
उन पर अपनी पलकें सटाओ तो
एक राग पैदा होता है मन में ।
इसी राग की ख़ातिर
तो जीते हैं हम
इसी राग पल से तो अभी तक क़ायम है यह पृथ्वी ।
०००
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- बिनय सौरभ
गन्दा कर देते हैं पूरा घर-आँगन
रोज़-रोज़ धोओ पखारो
उनकी गन्दगी साफ़ करो
रोशनदान, मुंडेर सभी गन्दे हो गये हैं
-भगाओ इन्हें !
कई बार घर आए लोगों ने कहा है
हमने भी सोचा है कई बार !
अब क्या करें !
इनके साथ जीने की आदत जो पड़ गयी है हमारी
तीन पीढ़ियों का साथ निभाया है कबूतरों ने
ऐसे कैसे छोड़ दें ?
आँगन है - इन्हीं से तो पता चलता है
बहुत प्यार से देखो
तो कैसे चले आते हैं तुम्हारे पास
उन पर अपनी पलकें सटाओ तो
एक राग पैदा होता है मन में ।
इसी राग की ख़ातिर
तो जीते हैं हम
इसी राग पल से तो अभी तक क़ायम है यह पृथ्वी ।
०००
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- बिनय सौरभ

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