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विजय कुमार सप्पत्ति की नई कविताएँ



…………..चल वहां चल ……………
चल वहां चल , 
किसी एक लम्हे में वक़्त की उँगली को थाम कर !!!!
जहाँ नीली नदी खामोश बहती हो 
जहाँ पर्वत सर झुकाए थमे हुए हो 
जहाँ चीड़ के ऊंचे पेड़ चुपचाप खड़े हो
जहाँ शाम धुन्धलाती न हो  
जहाँ कुल जहान का मौन हो 
जहाँ खुदा मौजूद हो , उसका करम हो 
जहाँ बस तू हो 
चल वहाँ चल 
किसी एक लम्हे में वक़्त की उँगली को थाम कर !!!!
उसी एक लम्हे में मैं तुझसे मोहब्बत कर लूँगा  
© विजय

……………..जीवन…………….
हमें लिखना होगा जीवन की असफलताओं के बारे में 
ताकि फिर उड़ सके हम इतिहास के नभ में 
हमें फूंकना होगा टूटे हुए सपनों में नयी उर्जा 
ताकि मृत जीवन की अभिव्यक्ति को दे सके 
कुछ और नयी साँसे !
© विजय

.......कुछ लफ्ज़ तेरे नाम ............
मेरे उम्र के कुछ दिन , कभी तुम्हारी साडी में अटके तो कभी तुम्हारी चुनरी में ....
कुछ रातें इसी तरह से ; कभी तुम्हारी जिस्म में अटके तो कभी तुम्हारी साँसों में .....
मेरे ज़िन्दगी के लम्हे बेचारे बहुत छोटे थे.
वो अक्सर तुम्हारे होंठों पर ही रुक जाते थे.
फिर उन लम्हों के भी टुकड़े हुए हज़ार
वो हमारे सपनों में बिखर गए !
और फिर मोहब्बत के दरवेशों ने उन सपनों को बड़ी मेहनत से सहेजा . 
उन्हें बमुश्किल इबादत दी . 
और फिर अक्सर ही किसी बहती नदी के किनारे बिखेर दिए .
यूँ ही ज़िन्दगी के दास्तानों में हम नज़र आते है .. 
उन्हीं सपनों को चुनते हुए.. अपने आंसुओं से सींचते हुए..
गर्मी के मौसम में साँसों से हवा देते हुए और सर्दियों में उन्हीं साँसों से गर्माते हुए .
बारिशों में सपनों के साथ बहते हुए ..
कहानी बड़ी लम्बी है जानां ...
लेकिन मुझ में बड़ा हौसला है . कुछ खुदा की मेहर भी है
मैं हर रोज , 
अपनी बड़ी बेउम्मीद ज़िन्दगी से कुछ लम्हों में तुम्हारे लिए नज्में बुनता हूँ 
और फिर उन्हीं नज्मों के अक्षरों में तुझे तलाशता हूँ.
तुझे मेरा इकबाल करना होगा इस हुनर के लिए 
जो दरवेशों ने मुझे बक्शे हैं ....
मैं हर जन्म कुछ ऐसे ही गुजारना चाहता हूँ 
तेरे पलकों की छाँव में जहाँ तेरे हर अश्क में मेरी इस कहानी का अक्षर समाया हो .
हां , यही अब मेरी इल्तिजा है .
और यही मेरा प्यार है तेरे लिये जानां !
हाँ !
© विजय

…………….. ज़िन्दगी ..............
मैं खुदा के सजदे में था ;
जब तुमने कहा, ‘मैं चलती हूँ !’
.....इबादत पूरी हुई 
.............मोहब्बत ख़त्म हुई 
.................और ज़िन्दगी  ?
© विजय

“ क्षितिज ”
मिलना मुझे तुम उस क्षितिज पर
जहाँ सूरज डूब रहा हो लाल रंग में
जहाँ नीली नदी बह रही हो चुपचाप
और मैं आऊँ निशिगंधा के सफ़ेद खुशबु के साथ
और तुम पहने रहना एक सफेद साड़ी 
जो रात को सुबह बना दे इस ज़िन्दगी भर के लिए
मैं आऊंगा जरूर ।
तुम बस बता दो वो क्षितिज है कहाँ प्रिय ।
© विजय

“ रे मन ”
रूह की मृगतृष्णा में
सन्यासी सा महकता है मन

देह की आतुरता में
बिना वजह भटकता है मन

प्रेम के दो सोपानों में
युग के सांस लेता है मन

जीवन के इन असाध्य
ध्वनियों पर सुर साधता है मन

रे मन
बावला हुआ जीवन रे
मृत्यु की छाँव में बस जा रे
प्रभु की आत्मा पुकारे तुझे रे
आजा मन रे मन  !

© विजय

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