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बराबरी

सीखी हूँ मैं बूँदों से बराबरी करना ,
ये जब बरसता है तो ,
झोपड़ी से लेकर महल तक ,
नाला से लेकर नदियों तक ,
पहाड़ों से लेकर खेतों तक ,
बराबर का पानी देता है
पेड़ों से सीखी हूँ ,
 सूरज चाँद औ तारों से सीखी ,
हूँ ।
मानव ने तो स्वार्थ सिखाया ,
जब खूनो के रंग एक हैं ,
तो अलग अलग जाति धर्म ,
में क्यों बाँटा ?

जितने हम सबल होते गये ,
मानसिकता सिकुड़ती चली
गयी ।

प्रकृति की दुहाई देते हैं,
लेकिन अमल कहाँ कर पाते है?
अपने मद में रहते हैं ,
अपने से सरोकार रखते हैं ।
समाज की गतिविधियों को
नजरअंदाज  करते हैं ।
इसलिए तो अपने स्वार्थ के,
लिए प्रकृति का दोहन करते हैं ।

हमारा इतिहास तो रंगा पड़ा है
कई तरह के युद्धों से ,
महाभारत से लेकर रामायण तक ।

उसी की दुहाई देकर गलत काम
में लगे हुए हैं ।
सब खराब है ऐसा भी नही है ,
लेकिन अभी कुछ और की जरूरत है ।

स्नेह प्रभा पाण्डेय

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