फल
थम सा गया है जिन्दगी जैसे
वृद्धाश्रम के चहारदिवारी में..
निकल जाना चाहती हूँ आज फिर...
दूर...बहुत दूर....
ऑचल में छुपाये हुए चंद स्वादिष्ट फलों के साथ...
चुपचाप...
पहुँच जाना चाहती हूँ...
अपने जिगर के टुकड़े के पास |
बहुत पसंद है उसे,
सीताफल...
कश्मीरी सेव और
लाल दाना वाला अनार...
बचपन में वह...
अक्सर चुराकर खा जाता था....
अपने पिता के हिस्से के रखे गये फल भी ।
शायद यही वजह है कि...
आज भी वृद्धाश्रम में...
जब-जब बाँटे जाते हैं फल....
मेरे बूढ़े पति अपनी घुचघुची आँखे पोंछते हुए
मुझसे कहते हैं कि...
रख दे इन्हें संभालकर थैले में,जब मुन्ना हमसे मिलने
आएगा तो.....
आगे कुछ नहीं कह पाते वो ।
मैं बुढ़िया,
माँ जो ठहरी...
हर तड़प सह लेती हूँ,
सह न सकती तो सिर्फ...
इस बूढ़े पिता की तड़प ...
इसलिए...
निरंतर प्रयास करती हूँ कि...
निकल पड़ू चुपके से और पहँच जाऊँ...
शहर के उस बंगले में...
जहाँ मेरा अलमस्त लाल..
अपनी खुबसुरत बीबी और बच्चों के साथ रहता है ।
कि-
अचानक पाँव रूक जाता है ।
अन्तर्मन से आवाज आती है..
रूक जा पगली...कहाँ जा रही है तू ?
अब वह तेरा लाल नही रहा..
हाँ, उसका लाल अवश्य है ।
जो देख रहा है आज सबकुछ..
कल इतिहास दोहराएगा...
वही लाल इसी वृद्धाश्रम मे...
तेरे जिगर के टुकड़े को आश्रय दिलवाएगा |
इसलिए
तू चिंता न कर !
आज नहीं तो कल...
तेरा लाल फल जरूर पाएगा ।
जी घबराया
क्या ?
नहीं,नही...मेरा लाल नादान है।
अनजान है।
दोष समय की है
मेरे लाल की नहीं।
कोई करें तो बाँका उसका बाल सही ?
समय परिवर्तनशील है।
आज नहीं तो कल वह समय पुनः वापस आएगा..
जब घर-घर में श्रवण कुमार पैदा लेकर
अपने माता-पिता को कंधे पे बिठाएगा।
समय,जरा जल्दी चल...
देर हो चुकी बहुत
मेरे लाल के लिए ले जाना है
आज मुझे फल ।।
ममता बनर्जी "मंजरी
वृद्धाश्रम के चहारदिवारी में..
निकल जाना चाहती हूँ आज फिर...
दूर...बहुत दूर....
ऑचल में छुपाये हुए चंद स्वादिष्ट फलों के साथ...
चुपचाप...
पहुँच जाना चाहती हूँ...
अपने जिगर के टुकड़े के पास |
बहुत पसंद है उसे,
सीताफल...
कश्मीरी सेव और
लाल दाना वाला अनार...
बचपन में वह...
अक्सर चुराकर खा जाता था....
अपने पिता के हिस्से के रखे गये फल भी ।
शायद यही वजह है कि...
आज भी वृद्धाश्रम में...
जब-जब बाँटे जाते हैं फल....
मेरे बूढ़े पति अपनी घुचघुची आँखे पोंछते हुए
मुझसे कहते हैं कि...
रख दे इन्हें संभालकर थैले में,जब मुन्ना हमसे मिलने
आएगा तो.....
आगे कुछ नहीं कह पाते वो ।
मैं बुढ़िया,
माँ जो ठहरी...
हर तड़प सह लेती हूँ,
सह न सकती तो सिर्फ...
इस बूढ़े पिता की तड़प ...
इसलिए...
निरंतर प्रयास करती हूँ कि...
निकल पड़ू चुपके से और पहँच जाऊँ...
शहर के उस बंगले में...
जहाँ मेरा अलमस्त लाल..
अपनी खुबसुरत बीबी और बच्चों के साथ रहता है ।
कि-
अचानक पाँव रूक जाता है ।
अन्तर्मन से आवाज आती है..
रूक जा पगली...कहाँ जा रही है तू ?
अब वह तेरा लाल नही रहा..
हाँ, उसका लाल अवश्य है ।
जो देख रहा है आज सबकुछ..
कल इतिहास दोहराएगा...
वही लाल इसी वृद्धाश्रम मे...
तेरे जिगर के टुकड़े को आश्रय दिलवाएगा |
इसलिए
तू चिंता न कर !
आज नहीं तो कल...
तेरा लाल फल जरूर पाएगा ।
जी घबराया
क्या ?
नहीं,नही...मेरा लाल नादान है।
अनजान है।
दोष समय की है
मेरे लाल की नहीं।
कोई करें तो बाँका उसका बाल सही ?
समय परिवर्तनशील है।
आज नहीं तो कल वह समय पुनः वापस आएगा..
जब घर-घर में श्रवण कुमार पैदा लेकर
अपने माता-पिता को कंधे पे बिठाएगा।
समय,जरा जल्दी चल...
देर हो चुकी बहुत
मेरे लाल के लिए ले जाना है
आज मुझे फल ।।
ममता बनर्जी "मंजरी
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