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ईश्वर

नासमझ बचपन सोचता है कोई तो है ईश्वर,
जिसको हाथ जोड़ नतमस्तक हैं लोग,
वो क्या जाने क्या लोक क्या परलोक,
और जब होता है कुछ समझदार,
सोचता है इक अनदिखे के सामने
क्यों खड़े हैं हमलोग?
जिज्ञासु हो जाता है मन,
बिन समझे कैसे थामे
लोगों की बातों का दामन,
उस अनदिखे अनजाने की सत्ता को
नकार देता है मन,
जो नहीं दिखता ,बातें नहीं करता
उसे कैसे माने भगवन!
यूँ बीत जाते हैं कई दिन और कभी कई वर्ष,
जीवन को जीने लगता है सहर्ष,
अचानक आता है जीवन में ऐसा मोड़,
कुछ ऐसा होता है घटित,
कुछ आश्चर्यजनक कुछ चमत्कारिक ,
विश्वास नहीं कर पाता है,
पर जो सामने है दृश्य है,
नकारे कैसे उसका अस्तित्व,
बस हो जाता है विश्वास उस सत्ता का,
उसकी महत्ता का,
उस अनदिखे का जिसे कहते हैं ईश्वर ,
और मन हो जाता है मुदित,
पनपने लगता है विश्वास का बीज,
जो हो जाता है अंकुरित कुसुमित और फिर सुरभित
एक असीम आनन्द से तृप्त,
अवर्णनीय भावों से जीवन हो जाता है प्रफुल्लित,
अब जीने की सोच दिशा और लक्ष्य ,
सब बदल जाता है,
मान लेते हैं कि ईश्वर का है अस्तित्व
अनिता"निःशब्द"।

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