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जो जख्मों में भी जियें जा रहे हैं

मैं जख्मों को देख , घबरा गया था अपनी !
पर ऐसे कई हैं यहाँ , जो जख्मों में भी जियें जा रहे हैं
पर्दे छिपा सकते हैं आंसू , हमारे कल और आज के !
पर कुछ लोग ऐसे भी हैं यहाँ , जो इसे भी सहेजकर ,
जिन्दगी जियें जा रहे हैं चुप्पी उनकी खुशी नहीं
पर कुछ लोग इसे , तोड़कर भी लोग, मुस्कुरा रहे हैं
मेरा जख्म तो कुछ भी नहीं , उनके जख्मों के आगे , मैं नाहक ही घबराया
मेरे जख्म कम ही थे , उनके जख्मों के आगे
सुरेन्द्र उपाध्याय

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