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चाहता न हो किसी को क्लेश


मै, महेश
चाहता न हो किसी को क्लेश
तंगी से पढ़ा
अच्छे संगत ने मुझे गढ़ा,
एमए,बीएड् हूँ
डिप-इन-ड्रामा कर जो संवेदना पाई है
उसे पुन:समाज को है लौटानी
यह सोंच कविता नाटक लिखता हूँ,
नशापान ना करता हूँ
और ना मांस भक्षता हूँ
      जो दूसरो को करने से रोकू
पहले उसपर खुद अमल करता हूँं,
अंधविश्वास को दूर भगाकर
वैज्ञानिकता को पूजता हूँ,
नित्य करता योग-प्राणायाम
उस क्षण ईश्वर से बातें करता हूँ
शाम-सवेरे संगीत साधना
करता रहता हूँ हरदम
होती है तब महसूस मुझे
ईश्वर भी घर मेरे आते होंगे,
गिरिडीह है शहर अपना
उसरी किनारे है कुटिया
माता-पिता, भाई का साया
मुझसे दूर हो गई है,
रोता हूँ जिस क्षण मैं
कविता जन्म ले लेती है,
भाईचारा अमन-चैन का हो शाषण
यही कामना करता हूँ,
छोटी सी यही परिचय अपनी
सबों को सम्मान करता हूँ।

महेश"अमन"
रंगकर्मी
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